शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*२१०. परिचय पराभक्ति(श्री दादूवाणी)*
जोगी जान जान जन जीवै ।
बिन ही मनसा मन हि विचारै, बिन रसना रस पीवै ॥टेक॥ 
बिनही लोचन निरख नैन बिन, श्रवण रहित सुन सोई ।
ऐसै आतम रहै एक रस, तो दूसर नाम न होई ॥१॥ 
बिन ही मार्ग चलै चरण बिन, निहचल बैठा जाई ।
बिन ही काया मिलै परस्पर, ज्यों जल जलहि समाई ॥२॥ 
बिन ही ठाहर आसण पूरे, बिन कर बैन बजावै ।
बिन ही पावों नाचै निशिदिन, बिन जिभ्या गुण गावै ॥३॥ 
सब गुण रहिता सकल बियापी, बिन इंद्री रस भोगी ।
दादू ऐसा गुरु हमारा, आप निरंजन जोगी ॥४॥
टीका - ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव इसमें पराभक्ति का स्वरूप कह रहे हैं कि हे जिज्ञासुओं ! योगीजन अष्टांग योग के साधनों द्वारा, मायिक प्रपंच को मिथ्या जानकर, परब्रह्म को सत्य स्वरूप जानकर जीवनमुक्त होकर रहते हैं । वह सांसारिक भावना से रहित होकर अर्न्तमुख मन बुद्धि द्वारा स्वस्वरूप का विचार करते हैं । रसना बिना ही स्वरूपानन्द रस का पान करते हैं । 
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बाह्य नेत्रों के बिना ज्ञान नेत्रों से स्वस्वरूप स्थिति देखते हैं । बाह्य श्रवणों बिना ही अन्तर्मुख वृत्ति रूप श्रोत्र से, उस आत्मस्वरूप ब्रह्म का अभेद निश्चय रूप श्रवण करते हैं । 
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यदि उक्त प्रकार आत्मस्वरूप ब्रह्म में अद्वैत रूप से स्थित रहें तो द्वैत का कुछ भी भान नहीं होता । जो बाह्य मार्ग रूप चरणों के बिना ही साधन रूप चरणों से आत्म - स्वरूप ब्रह्म के पास जाकर बैठा है और बिना ही शरीर से, आत्मा तथा ब्रह्म परस्पर मिलकर जैसे जल में जल समाता है, ऐसे ब्रह्म में समा गया है । 
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सांसारिक स्थान बिना ही परब्रह्म में पूर्ण अभेद रूप से आसन लगाया है और बहिरंग हाथों के बिना ही अनहद ध्वनि रूप बंशी बज रही है । बाह्य पैरों के बिना ही भावना रूप पैरों से रात - दिन अन्तःकरण में नृत्य होता है । बाह्य जिह्वा बिना ही अन्तर्मुख वृत्ति द्वारा गुणानुवाद गाते हैं । 
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सम्पूर्ण मायिक गुणों से रहित, सकल व्यापी परमेश्वर का दर्शनामृत रूप रस को बिना इन्द्रियों के ही अन्तर्मुख वृत्ति द्वारा उपभोग करते हैं । ऐसे परब्रह्म रूप निरंजन ने आप स्वयं हमारे गुरु ने वृद्ध का रूप धारण कर हमको उपदेश किया है ।
चित्रकला संयोजन ~ मुक्ता अरोड़ा स्वरूप निश्चय

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