#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*जहँ वेद कुरान की गम नहीं, तहाँ किया परवेश ।*
*तहँ कछु अचरज देखिया, यहु कुछ औरै देश ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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**ज्ञान परिचय का अंग ५९**
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रज्जब निकसे मात मही१, सुत कीड़ी कण काज ।
सो पाये२ पैठे पुहमि३, सफल भये सब साज४ ॥२५॥
पृथ्वी१ से चींटी अन्न का दाने के लिये निकलती है और उसके मिलने२ पर पुन: पृथ्वी३ में प्रवेश कर जाती है, वैसे ही पुत्र माता द्वारा ब्रह्म प्राप्ति रूप कार्य के लिये जन्मता है, ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है तो उसके साधन४ सफल हो जाते हैं, और वह पुन: ब्रह्म में ही मिल जाता है ।
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रज्जब बूंद समुद्र की, कित१ सरकै कहें जाय ।
साझा सकल समुद्र सौं, त्यों आतम राम समाय ॥२६॥
समुद्र से उछल कर बिन्दु किधर१ सरकेगी ? और कहां जायेगी ? उसका तो सब प्रकार से समुद्र में ही साझा है, वैसे ही जीवात्मा राम से किधर सरकेगा और कहां जायेगा ? वह तो परिचय होने पर राम में ही समायेगा ।
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रज्जब रैनि अचेत१ में, दीपक ज्ञान प्रकाश ।
पै आदित्य अविगत२ उदय, इनका कहा उजास३ ॥२७॥
रात्रि में दीपक का प्रकाश रहता है किन्तु सूर्य उदय होने पर दीपक के प्रकाश३ का क्या महत्त्व रह जाता है ? वह तो सूर्य प्रकाश में ही विलीन हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी१ के हृदय में ज्ञान का प्रकाश होता है किन्तु ब्रह्म२ साक्षात्कार होने पर ज्ञान का क्या महत्त्व रह जाता है ? वह तो ब्रह्म में ही लीन हो जाता है, अद्वैत स्थिति में वृति का अभाव होने से वृत्ति ज्ञान भी नहीं रहता है ।
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उर१ आँगण अच्छा किया, ज्ञान बुहारी फेर ।
रज्जब प्रभु आँवन समय, यहो२ इकंति अयेर३ ॥२८॥
बुहारी लगा कर घर का आँगण साफ किया जाता है किन्तु स्वामी के आने के समय उसे२ उठा३ कर एकान्त स्थान में रखा दिया जाता है, वैसे ही ज्ञान के द्वारा अन्त:करण१ श्रेष्ठ बनाया जाता है । अर्थात संशय-विपर्य्यय हटाये जाते हैं किन्तु ब्रह्म साक्षात्कार के समय वह वहां नहीं रहता, कारण-ब्रह्म किसी ज्ञाता का ज्ञेय नहीं होता, तब ज्ञान उस समय कैसे रहेगा ? ब्रह्म तो आत्मास्वरूप होकर प्राप्त होता है ।
(क्रमशः)

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