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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज,श्री दादूद्वारा बगड,झुंझुनू ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
खंड खंड निज ना भया, इकलस एकै नूर ।
ज्यूं था त्यूं ही तेज है, ज्योति रही भरपूर ॥१०६॥
परम तेज प्रकास है, परम नूर निवास ।
परम ज्योति आनन्द में, हंसा दादू दास ॥१०७॥
नूर सरीखा नूर है, तेज सरीखा तेज ।
ज्योति सरीखी ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥१०८॥
सब भूतों में सामान, अखण्ड मायातीत एकरस अद्वितीय, सर्वसाक्षी है । जीव ब्रह्म की एकता होने से ज्ञानी उस ब्रह्म तेज के साथ क्रीड़ा करते रहते हैं । उसके सामान दूसरा कोइ प्रकाश नहीं । वह आदि अंत से रहित है । उसके कार्यों से उसकी महिमा को कोइ नहीं जनता । विश्व में जो कुछ ज्ञान का प्रकाश है वह सब उसी के प्रकाश से प्रकाशित है । उसमें सदा संत निवास करते हैं, अतः वह संतों का निवास स्थान है ।
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तेज पुंज की सुन्दरी, तेज पुंज का कंत ।
तेज पुंज की सेज पर, दादू बन्या वसंत ॥१०९॥
जीव और ईश्वर - दोनों ही चेतन होने से प्रकाशरूप हैं । अष्टदलकमल स्थित ब्रह्मशय्या भी तेजस्वरूपा है । वहाँ दोनों एक हो जाते हैं । अत: वसन्तोत्सव की तरह दोनों आनन्दोत्सव मना रहे हैं । समाधिअवस्था में वे अत्यधिक आनन्द का अनुभव कर रहे हैं ।
हठयोगदीपिका में लिखा है :: “जैसे लवण-जल के संयोग से जलरूप हो जाता है वैसे ही आत्मा और मन की एकता है । अर्थात् आत्मा में धारण किया हुआ मन आत्माकार होने से आत्मरूपता को प्राप्त हो जाता है । अत: आत्मा और मन की समाधि कहलाती है । जब संकल्प विकल्प भली प्रकार क्षीण हो जाते हैं और मन का भी लय हो जाता है । तब उस समय की समाहित अवस्था को ही ‘समाधि' कहते हैं । जीवात्मा और परमात्मा की एकता को ही 'समता' कहते हैं । अर्थात् नष्ट संकल्पावस्था को समाधि कहते हैं । यही दादू बन्या वसन्त का तात्पर्य है ।”
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पुहुप प्रेम वर्षे सदा, हरिजन खेलैं फाग ।
ऐसे कौतुक देखिए, दादू मोटे भाग ॥११०॥
दादूराम जी महाराज आनन्दोत्सव का वर्णन कर रहे हैं - पुहुप प्रेम वरखें सदा । उस समाधि दशा में चित्तवृक्ष से ऐसी प्रेमपुष्पों की वर्षा होती है जैसे मेघों से वर्षों की धारा और हरिभक्त वसन्तोत्सव की तरह प्रेमोत्सव मना रहे हैं । अर्थात् जीव और परमात्मा की ऐक्य दशा में भक्तजन अद्भुत आनन्द रस का आस्वाद ले रहे हैं । अहो ! वे कितने भाग्यवान् हैं ।
(क्रमशः)

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