रविवार, 27 जनवरी 2019

= सुन्दरी का अँग(३०-१०/१२) =


#daduji

॥ दादूराम सत्यराम ॥

*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*सुन्दरी का अँग*
सुन्दरी विलाप
दादू हूँ सुख सूती नींद भर, जागे मेरा पीव ।
क्यों कर मेला होइगा, जागे नाँहीं जीव ॥१०॥
१० - १६ में वियोगिनी सुन्दरी का विलाप दिखा रहे हैं, मेरा स्वामी परमात्मा तो निरँतर जागता ही रहता है किन्तु मैं ही वियोग जन्य दु:ख से व्यथित नहीं हुई तथा विषयों में ही सुख मान कर घोर अज्ञान - निद्रा में सूती हूं । जब तक मेरा अन्त:करण अज्ञान - निद्रा को त्याग कर, ज्ञान - जागृत में नहीं आयेगा, तब तक उससे मिलन कैसे होगा ?
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सखी न खेले सुन्दरी, अपने पीव सौं जाग ।
स्वाद न पाया प्रेम का, रही नहीं उर लाग ॥११॥
हे सँत - सखी ! जब तक इस जीवात्मा - सुन्दरी ने अज्ञान निद्रा से जागकर परब्रह्म स्वामी के साथ उसी का चिन्तन रूप खेल खेलते हुये उसके स्वरूप रूप छाती से लगकर अभेद स्थिति में परमानन्द नहीं प्राप्त किया, तो जीवन व्यर्थ ही है ।
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पँच दिहाड़े पीव सौं, मिल काहे न खेले ।
दादू गहली सुन्दरी, क्यों रहे अकेले ॥१२॥
अरी मेरी जीवात्मा रूप पगली सुन्दरी ! सप्ताह में एक दिन जन्म का और एक मरण का छोड़ कर पाँच ही दिन तो जीवन के हैं । तू शीघ्र ही साधन द्वारा परब्रह्म से मिलकर उनका साक्षात्कार रूप खेल क्यों नहीं खेलती ? तू अकेली रह कर क्यों खेद उठा रही है ?
(क्रमशः)

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