#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १५.राग सिंधूड़ो =*
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(२/२)
*पीसै दांत पिसण कै ऊपरि कै ऊपरि हाथ गहै हथियारा रे ।*
*नेजा धारी निरषि फौज मैं मारै मन सिरदारै रे ॥३॥*
*जहां छूटै तीर झड़ाझड़ि बींचै तहां स्याबतौ आवै रे ।*
*सुन्दर लटकौ करै स्याम कौं तब तौ सूर कहावै रे ॥४॥*
वह दांत कटकटाता हुआ, तीक्ष्णशस्त्र लेकर वैरी पर आक्रमण करता है । और हाथ में तलवार लेकर विरोधी सेनापति को एकान्तत: लक्ष्य बनाकर उसी पर टूट पड़ता है ॥३॥
उस युद्ध में दोनों पक्षों से निरंतर(=झड़ा झड़) तीर तलवार आदि शास्त्रों का प्रहार होने लगता है तो पीछे हट कर घायल न होने की बात किसी के मन में नहीं होती । महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं –युद्ध में जो वीरता के विलक्षण कृत्य दिखायेगा । वही ‘वीर’ कहलायगा । केवल मौखिक बातों से कुछ नहीं होना है ॥४॥
(क्रमशः)

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