बुधवार, 30 जनवरी 2019

परिचय का अंग १२१/१२४

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
ऐसी एकै गाय है, दूझै बारह मास ।
सो सदा हमारे संग है, दादू आतम पास ॥१२१॥
बारहों मास उस दूध का दोहन होता रहता है । और वह सकल संसार की निर्माणकर्त्री ब्रह्मरूपी कामधेनु सबके पास ही रहती है । वह एक है । उस का दोहन श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा अखण्ड ब्रह्माकार वृत्ति ही है । वह सदा समीप ही रहती है । क्योंकि जीव-ब्रह्म का ऐक्य बताया गया है ।
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तरुवर शाखा मूल बिन, धरती पर नाहीं ।
अविचल अमर अनन्त फल, सो दादू खाहीं ॥१२२॥
अब महात्मा ब्रह्म का एक अद्भुत वृक्ष के रूप में वर्णन कर रहे हैं । सब की आधारभूत पृथ्वी भी इस ब्रह्मवृक्ष का आधार नहीं कही जा सकती है, क्योंकि यह समग्र जगत प्रपञ्च ब्रह्म में कल्पित है, अत: पृथ्वी भी उसमें कल्पित है । अत: अध्यस्त पृथ्वी ब्रह्म का आधार या अधिष्ठान नहीं हो सकती । शास्त्र का यह नियम है कि अध्यस्त जिसमें कल्पित है उसका वह अधिष्ठान नहीं हो सकता । जबकि ब्रह्म सब का अधिष्ठान है । अत: पृथ्वी कल्पित होने से ब्रह्म का अधिष्ठान नहीं बन सकती । इसी अभिप्राय से महाराज ने कहा है - *धरती पर नाहीं* ।
उस ब्रह्मवृक्ष का कोई मूल(कारण) नहीं है । और शाखा(कार्य) नहीं है । श्रुति भी कहती है - “ब्रह्म का कोई कारण नहीं,न उसका कोई कार्य है ।”
इस ब्रह्मवृक्ष के फल भी अविनाशी और अमर हैं । उन को मैं खाता हूँ, अर्थात् अनुभव करता हूँ ।
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तरुवर शाखा मूल बिन, धर अम्बर न्यारा ।
अविनाशी आनन्द फल, दादू का प्यारा ॥१२३॥
*घर अंबर न्यारा* - इसका भाव यह है कि वह ब्रह्म वृक्ष सर्वव्यापक होने पर भी पृथ्वी और आकाश में वह नहीं है । उसके साक्षात्कार से पैदा होने वाला आनन्द रूप फल भी अविनाशी है । वे फल मुझे अच्छे लगते हैं । यहाँ पृथ्वी और आकाश भूतमात्र का उपलक्षण हैं ।
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तरुवर शाखा मूल बिन, रज वीरज रहिता ।
अजर अमर अतीत फल, सो दादू गहिता ॥१२४॥
“समस्त भूतों में एक ब्रह्म है, परन्तु सम्पूर्ण भूत उसका स्पर्श भी नहीं कर सकते । अत: दर्शनरूपी फल से मैं कभी विमुख नहीं होता ।”
(क्रमशः)

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