मंगलवार, 29 जनवरी 2019

= *ज्ञान परिचय का अंग ५९(२९/३२)* =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*सहज शून्य सब ठौर है, सब घट सबही माहिं ।*
*तहाँ निरंजन रम रह्या, कोई गुण व्यापै नाहीं ॥* 
===============
**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
**ज्ञान परिचय का अंग ५९**
.
बुद्धि विचार की चालनी, त्रिगुण सर्व तुस छाने । 
आटा अन्त:करण भया शुचि, करी चालनी काने ॥२९॥ 
चालनी से तुष छानने पर आटा शुद्ध हो जाता है तब चालनी अलग रख देते हैं, वैसे ही बुद्धि द्वारा विचार करके अंत:करण से तीनों गुण निकाल देते हैं, तब अन्त:करण शुद्ध, स्थिर ओर भेद ज्ञान से रहित होनै पर विचार को एक ओर रख कर ज्ञानी अद्वैत -निष्ठा ही रहते हैं । 
अविगत अंब आतम फल लागै, नीच ऊंच अंतर भ्रम भागै । 
मुख भुज पेट पाँई गति एकै, पारस पिंड न भिन्न विवेकै ॥३०॥ 
आम्र वृक्ष के फल लगते हैं, वे छोटे-बड़े सभी आम कहलाते हैं, वैसे ही परमात्मा से आत्मा होते हैं उनमें नीच-ऊंच भेद का भ्रम विचार द्वारा भाग जाता है, पारस से स्पर्श होने पर लोहे के छोटे बड़े सभी खण्ड सुवर्ण बन जाते हैं, वैसे ही मुख से ब्राह्मण, भुज से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न होते हैं, उन सब के शरीरों की भिन्नता का विवेक परमात्मा के यहाँ नहीं रहता उसकी प्राप्ति का साधन करने पर उनसे परिचय होते ही सबको एक ही स्वरूप की प्राप्ति होती है । 
सब ठाहर समसर प्रभु, ज्यों मीश्री का गात । 
ता माँहिं दुविधा कहै, सो सब झूठी बात ॥३१॥ 
मिश्री के बने हुये शरीर में सर्वत्र मिठास समान होता है, वैसे ही विश्व के सब शरीर रूप स्थलों में परमात्मा समान हैं, उनके स्वरूप में जो किसी में अधिक, किसी में न्यून रहता रूप दुविधा का कथन करते हैं सो सब बातें मिथ्या हैं । 
स्रक सुगंध शीतल सब ठाहर, विपिन विभेदन काया कोय । 
तो रज्जब जो सदा एक रस, चतुर भाँति कैसे तन होय ॥३२॥ 
वन को चंदन बनाने वाल कोई चंदन होता है तब उसकी सुगंध तथा शीतलता सभी वृक्षों में समान रूप से आती है फिर जो सदा एक रस रहने वाला ब्रह्म है उससे चार प्रकार के शरीर कैसे हो सकते हैं ? उससे तो यह मानव एक प्रकार ही होता है फिर कर्मानुसार ब्रह्मणादि नाना नाम रख लिये जाते हैं फिर प्रभु से परिचय होने पर वह काल्पनिक भेद दूर होकर सभी एक ब्रह्मस्वरूप को ही प्राप्त होते हैं । 
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित ज्ञान परिचय का अंग ५९ समाप्त ॥सा. १९२९॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें