#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सुन्दरी का अँग*
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सखी सुहागिनि सब कहैं, प्रकट न खेले पीव ।
सेज सुहाग न पाइये, दुखिया मेरा जीव ॥१६॥
सँत - सखी ! मुझे सभी कहते हैं, इसे प्रभु प्राप्त हैं, किन्तु प्रकट रूप से तो परमात्मा मेरे साथ अरस - परस रूप खेल नहीं खेते । मेरी हृदय - शय्या पर निरन्तर विराजे रहें, ऐसा सुहाग - सुख मुझे नहीं प्राप्त हो रहा है । अत: मेरा मन बड़ा दु:खी है ।
प्रसंग ~ सांभर - सरोवर के मध्य की छतरी पर महाराज ध्यानस्थ था । उसी समय वहां एक सँत जा पहुंचे और ध्यान खुने पर "आप भगवत् प्राप्त सँत हैं", ऐसी बातों द्वारा महाराज की स्तुति करने लगे तब उन्हीं सँतजी को १३ से १६ तक की साखियां कही थीं ।
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सखी सुहागिनि सब कहैं, प्रकट न खेले पीव ।
सेज सुहाग न पाइये, दुखिया मेरा जीव ॥१६॥
सँत - सखी ! मुझे सभी कहते हैं, इसे प्रभु प्राप्त हैं, किन्तु प्रकट रूप से तो परमात्मा मेरे साथ अरस - परस रूप खेल नहीं खेते । मेरी हृदय - शय्या पर निरन्तर विराजे रहें, ऐसा सुहाग - सुख मुझे नहीं प्राप्त हो रहा है । अत: मेरा मन बड़ा दु:खी है ।
प्रसंग ~ सांभर - सरोवर के मध्य की छतरी पर महाराज ध्यानस्थ था । उसी समय वहां एक सँत जा पहुंचे और ध्यान खुने पर "आप भगवत् प्राप्त सँत हैं", ऐसी बातों द्वारा महाराज की स्तुति करने लगे तब उन्हीं सँतजी को १३ से १६ तक की साखियां कही थीं ।
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*अन्य लग्न व्यभिचार*
पुरुष पुरातन छाड़कर, चली आन के साथ ।
सो भी संग तैं बीछुट्या, खड़ी मरोड़े हाथ ॥१७॥
१७ में कहते हैं - व्यभिचार से दु:ख होता है, जो जीवात्मा - सुन्दरी परब्रह्म रूप पुराने पुरुष सनातन को छोड़, अन्य नूतन पति देव के साथ लगती है, तो वह पतिदेव विनाशी होने से उसके संग से जब बिछुड़ता है, तब "हाय ! अब क्या करूँ" कह कर खड़ी - खड़ी अपने हाथ मरोड़ती हुई पछताती है । अत: अविनाशी परमात्मा को ही सच्चा स्वामी मानें ।
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*सुन्दरी - विलाप*
सुन्दरि कबहूं कंत का, मुख सौं नाम न लेइ ।
अपने पिव के कारणैं, दादू तन मन देइ ॥१८॥
१८ - २२ में साधक सुन्दरी का विलाप दिखा रहे हैं, जैसे सुन्दरी अपने मुख से तो पति का नाम उच्चारण भी नहीं करती किन्तु पति के लिए अपने तन मन को निछावर कर देती है । वैसे ही उच्चकोटि के सँत उच्च - स्वर से तो हरि का नाम उच्चारण नहीं करते, किन्तु भीतर उसकी प्राप्ति के लिये निरँतर विलाप करते हुये अपने तन - मन को प्रभु पर निछावर कर देते हैं ।
(क्रमशः)

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