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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*आदि अनन्त सोई घर पाया,*
*अब मन अनत न जाई ।*
*दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥*
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साभार ~ Ramchander Gupta
🌰 मनुष्य की खोज क्या है? मनुष्य की खोज है: अपने घर की खोज। यहां परदेश है। यहां सब वीराना है। अपना यहां कुछ भी नहीं। और यहां से जाना है। और जो थोड़ा-बहुत अपना मान लोगे, वह भी मौत छीन लेती है। यहां घर तो कोई कभी बना नहीं पाया। यहां तो घर उजड़ने को ही बनते हैं। यहां तो घर बन भी नहीं पाते कि उजड़ जाते हैं। यहां हम ही नहीं टिक पाते, तो हमारे बनाए घर कैसे टिकेंगे? यहां की गई मेहनत तो अकारथ जाती है।
आदमी की खोज उस घर की खोज है, जो मिले तो सदा के लिए मिल जाए। आदमी की खोज उस घर की खोज है जो सच में घर हो, सराय न हो। यहां तो सब सरायें हैं, धर्मशालाएं हैं--बस रैनबसेरा है। सुबह हुई, चल पड़ना होगा। बहुत मोह मत लगा लेना। सराय से बहुत ममता बिठा लेना। यह छूट ही जाना है। यह छूटा ही हुआ है। तुमसे पहले बहुत लोग यहां ठहरे और गए; तुम भी उसी कतार में हो।
इसलिए चाहे यहां कितना ही धन हो, कितना ही पद हो, प्रतिष्ठा हो; फिर भी तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति यहां मिलती ही नहीं। तृप्ति का संसार से कोई संबंध ही नहीं है। अक्सर ऐसा होता है कि गरीब को तो थोड़ी आशा भी रहती है, अमीर की आशा भी टूट जाती है। गरीब को तो लगता है कि एक मकान होगा अपना, तो शांति होगी। थोड़ा धन-संपत्ति होगी; सुविधा होगी; फिर सुख और चैन से रहेंगे।
उसे यह पता ही नहीं है कि सुख-चैन यहां हो नहीं सकता। धर्मशाला में कैसा सुख-चैन? कब उठा लिए जाओगे...! आधी रात में पुकार लिए जाओगे! कब मौत का दूत द्वार पर खड़ा हो जाएगा और दस्तक देने लगेगा--कुछ भी तो नहीं कहा जा सकता! यहां चैन कैसे हो सकता है? बेचैनी यहां स्वाभाविक है।
जैसे ही यह खयाल बहुत स्पष्ट हो जाता है, कांटे की तरह चुभने लगता है प्राणों में कि यह हमारा घर नहीं--तब एक खोज शुरू होती है--असली घर की खोज।
👣पद घंघरू बांध,🌻🍁ओशो 🍁🌹साभार

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