#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*संगि सदा हेत हरि लागो, अंगि और नहिं आवे ।*
*दादू दीन दयाल दमोदर, सार सुधा रस भावे ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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**परिचय भोले भाव का अंग ६०**
इस अंग में भोले भक्तों के परिचय संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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भोले सौं भोले प्रभु, स्याणे सौं स्याणे ।
जन रज्जब साधों सिधों, इहि भांति वखाणे ॥१॥
भगवान भोले भक्तों के साथ भोले बन जाते हैं और चतुरों के साथ चतुर बन जाते हैं, सिद्ध संतों ने इस प्रकार ही कहा है ।
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स्याणों१ हु सौं स्याणों प्रभु, भोलों सौं भोले ।
बालक बुधि२ बिन बाल हैं, अंतर पट खोले ॥२॥
भगवान चतुरों१ के साथ चतुर हो जाते हैं ओर भोलों के साथ भोले बन जाते हैं, बालक बुद्धि२ के बिना भी वे बालक के साथ बालक बन जाते हैं और भक्त के भीतर के अज्ञान रूप परदे को खोल देते हैं ।
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स्याणे१ याणे२ होत हैं, बाप पूत की लार ।
बाणी बोलै तोतरी, उस बालक के प्यार ॥३॥
बुद्धिमान१ पिता भी पुत्र के साथ अनजान२ से बन जाते हैं और उस बालक के प्रेम से उसके तोतली वाणी बोलते हैं वैसे ही बाल भक्तों के लिये भगवान भी करते हैं ।
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प्रचंड प्रीति बुधि बाल के, पितहिं नचावे नांच ।
जन रज्जब ज्यों जीव को, खेल खिलावै पांच ॥४॥
जैसे जीव को पाँचों ज्ञानेन्द्रिय नाँच नचाती हैं और बालक पुत्र पिता को नाँच नचाता है, वैसे ही बाल बुद्धि भक्त प्रचंड प्रीति से परमात्मा को नाँच नचाते हैं ।
(क्रमशः)

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