रविवार, 27 जनवरी 2019

= *ज्ञान परिचय का अंग ५९(२१/२४)* =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*मन मनसा का भाव है, अन्त फलेगा सोइ ।*
*जब दादू बाणक बण्या, तब आशय आसण होइ ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
**ज्ञान परिचय का अंग ५९**
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बिन परिचय सब वार हैं, परिचय१ प्राणी पार । 
जन रज्जब साँची कही, ता में फेर न सार ॥२१॥ 
२० की साखी के अनुसार ब्रह्म का परिचय नहीं होने से सब संसार - सागर के इस और ही हैं और जिनने उक्त प्रकार ब्रह्म को पहचान१ लिया है, वे संसार - सागर से पार जाकर तथा ब्रह्म को प्राप्त होकर ब्रह्मस्वरूप ही हो गये हैं, यह बात हमने यथार्थ ही कही है, साररूप होने से इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं है । 
लोह काट काष्ठ को घुण हु, आरोगे१ बिच आग । 
त्यों रज्जब ग्रास्या गुण हु, ज्वाला ज्योति न जाग ॥२२॥ 
प्रज्वलित अग्नि ज्वाला में न पड़े तब तक ही लोह को काट और काष्ठ को घुण खाते हैं, अग्नि में पड़ने पर तो काट और घुणों को अग्नि खा जाती१ है, वैसे ही जब तक ब्रह्मज्ञान रूप ज्योति नहीं जगती तब तक ही जीव को कामादि गुण व्यथित करते हैं, ज्ञान होने पर तो गुण नष्ट हो जाते हैं अर्थात व्यथित नहीं कर पाते । 
रज्जब रहै न शून्य१ थल, चेतन चेतन जान । 
शब्द शोर२ ज्यों श्रवण लग, अर्थ विचार समाय ॥२३॥ 
आकाश१ घट-मठादि स्थल में बद्ध नहीं रहता वह तो घट-मठादि की दृष्टि से बद्ध-सा भासता है । घट-मठादि के नष्ट होते ही महाकाश में मिल जाता है, वैसे ही चेतन आत्मा गुणों में बद्ध नहीं रहता वह तो देह द्वय के अभाव में ब्रह्म चेतन में ही जा मिलता है, जैसे शब्द रूप गुण का कोलाहल२ श्रवण इन्द्रिय तक ही रहता है, आगे तो अर्थ विचार कर वृत्ति उसके लक्ष्यार्थ ब्रह्म में ही लय होती है, वैसे ही ब्रह्म-ज्ञान होने पर आत्मा ब्रह्म में ही मिल जाता है । 
सौदा१ करणा शून्य में, तहँ कछु सूझे नाँहिं । 
रज्जब वित२ बिन जैत३ हो, बड व्यौपार्यों४ माँहिं ॥२४॥ 
जिस विकार शून्य ब्रह्म में अन्य कुछ भी नहीं दीखता उस अद्वैत स्थिति के लिये ही हमें अपने को समर्पण करके ब्रह्म साक्षात्कार करना रूप व्यापार१ करना है, इस व्यापार में सुवर्णादि धन२ के बिना जय३ होती है और जीतने वाला ज्ञानी व्यापारियों४ में महान माना जाता है ।
(क्रमशः)

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