रविवार, 27 जनवरी 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*गूंगा गहिला बावरा, सांई कारण होइ ।*
*दादू दीवाना ह्वै रहै, ताको लखै न कोइ ॥* 
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साभार ~ Dharmesh Mistry

कृष्ण जब ‘मैं’ शब्द का प्रयोग करते हैं, तो केवल व्यावहारिक है; बोलना है, इसलिए करते हैं; कहना है, इसलिए करते हैं। लेकिन कहने और बोलने के बाद वहा कोई ‘मैं’ नहीं है। अगर तुम आंख में आंख डाल कर कृष्ण की देखोगे तो वहां तुम किसी ‘मैं’ को न पाओगे। वहा परम सन्नाटा है, शून्य है। वहा मैं विसर्जित हुआ है। इसलिए तो इतनी सरलता से कृष्ण कह पाते हैं कि आ, मेरी शरण आ जा ! जब वे कहते हैं कि आ, मेरी शरण आ जा, तो हमें लगेगा बड़े अहंकार की घोषणा हो गयी। क्योंकि हम ‘मैं’ का जो अर्थ जानते हैं वही अर्थ तो करेंगे।
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जनक के ये वचन तो तुम्हें और भी चकित कर देंगे। ऐसे वचन पृथ्वी पर दूसरे हैं ही नहीं। कृष्ण ने तो कम—से—कम कहा था, ‘आ, मेरी शरण आ’; जनक के ये वचन तो कुछ ऐसे हैं कि तुम भरोसा न करोगे। इन वचनों में जनक कहते हैं कि ‘अहो ! अहो, मेरा स्वभाव ! अहो, मेरा प्रकाश ! आश्चर्य ! यह मैं कौन हूं ! मैं अपनी ही शरण जाता हूं ! नमस्कार मुझे !’ यह तुम हैरान हो जाओगे। 
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इन वचनों में जनक अपने को नमस्कार करते हैं। यहां तो दूसरा भी नहीं बचा। बार—बार कहते हैं, ‘मैं आश्चर्यमय हूं ! मुझको नमस्कार है !’
अहो अहं नमो मखं विनाशो यस्य नास्ति मे।
मैं इतने आश्चर्य से भर गया हूं, मैं स्वयं आश्चर्य हूं। मैं अपने को नमस्कार करता हूं। क्योंकि सभी नष्ट हो जायेगा, तब भी मैं बचता हूँ। ब्रह्मा से ले कर कण तक सब नष्ट हो जायेगा, फिर भी मैं बचूंगा। मुझे नमस्कार है ! मुझ जैसा दक्ष कौन ! संसार में हूं—और अलिप्त ! जल में कमलवत! मुझे नमस्कार है !
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मनुष्य—जाति ने ऐसी उदघोषणा कभी सुनी नहीं : ‘अपने को ही नमस्कार!’ तुम कहोगे, यह तो अहंकार की हद हो गयी। दूसरे से कहते, तब भी ठीक था, यह अपने ही पैर छू लेना..!
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ऐसा उल्लेख है रामकृष्ण के जीवन में कि एक चित्रकार ने रामकृष्ण का चित्र उतारा। वह जब चित्र लेकर आया, तो रामकृष्ण के भक्त बड़े संकोच में पड़ गये, क्योंकि रामकृष्ण उस चित्र को देख—देख कर उसके चरण छूने लगे। वह उन्हीं का चित्र था। उसे सिर से लगाने लगे। किसी भक्त ने कहा, परमहंसदेव, आप पागल तो नहीं हो गए हैं? यह चित्र आपका है।
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रामकृष्ण ने कहा, खूब याद दिलायी, मुझे तो चित्र समाधि का दिखा। जब मैं समाधि की अवस्था में रहा होऊंगा, तब उतारा गया। खूब याद दिलायी, अन्यथा लोग मुझे पागल कहते। मैं तो समाधि को नमस्कार करने लगा। यह चित्र समाधि का है, मेरा नहीं।
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लेकिन जिन्होंने देखा था, उन्होंने तो यही समझा होगा न कि हुआ पागल आदमी। अपने ही चित्र के पैर छूने लगा ! अपने चित्र को सिर से लगाने लगा ! अब और क्या पागलपन होगा? अहंकार की यह तो आखिरी बात हो गयी, इसके आगे तो अहंकार का कोई शिखर नहीं हो सकता।
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ओशो,
अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–1) प्रवचन–9

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