#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*केते पारिख जौहरी, पंडित ज्ञाता ध्यान ।*
*जाण्या जाइ न जाणिए, का कहि कथिये ज्ञान ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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**हैरान का अंग ६१**
इस अंग में परमात्मा के स्वरूपादी संबंधी आश्चर्यता का वर्णन कर रहे हैं -
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नींव सींव१ बिन शून्य२ घर, शिव रु शक्ति३ अस्थान ।
रज्जब मुकता४ मिति५ बिना, हेरि हुये हैरान६ ॥१॥
ब्रह्म रूप और माया३ रूप दोनों स्थान आकाश२ के समान नींव और सीमा१ से रहित हैं अर्थात ब्रह्म और ब्रह्म की लीला रूप माया अपार है । इन दोनों का अन्वेक्षण करते करते शास्त्र संतादि आश्चर्य से निश्चेष्ट६ हो कर सीमा५ न आने से अपार४ है इतना ही कहकर मौन हो गये हैं ।
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शून्य१ स्वरूपी सांइयाँ, रज्जब आभा२ माँहिं ।
प्रकट गुप्त दह३ दिशि फिर्या, पार सु पावै नाँहिं ॥२॥
आकाश१ में बादल२ प्रकट वा गुप्त रूप से दशों३ दिशाओं मे ही घूमता है किन्तु आकाश का पार नहीं पाता, वैसे ही जीव प्रकट वा गुप्त रूप से ब्रह्म में ही फिरता है परन्तु ब्रह्म का पार नहीं पा सकता ।
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इक सांई अरु शून्य१ के, आदि अंत मधि नांहि ।
शोधणहारे सब थके, जन रज्जब ता२ माँहिं ॥३॥
आकाश१ और ब्रह्म के स्वरूप का आदि, मध्य और अंत नहीं है, उन दोनों के आदि, मध्य और अंत को खोजने वाले सभी थक गये हैं किन्तु उनका वार-पार नहीं देख सके, उनके मध्य२ ही रहे हैं ।
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प्रथम शून्य को संग्रहै, को शोधै ता माँहिं ।
को पावै वा वस्तु को, जो रज्जब है नाँहिं ॥४॥
पहले तो आकाश को पकड़ ही कौन सकता है ? फिर उसमें खोजे भी क्या ? वैसे ही जो ब्रह्मरूप वस्तु पकड़ने योग्य है ही नहीं, उसे कौन पकड़ पायेगा, वह तो आत्मा स्वरूप से ही प्राप्त होता है ।
(क्रमशः)

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