शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग १२९/१३२

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
आतम के अस्थान हैं, ज्ञान ध्यान विश्वास ।
सहज शील संतोष सत, भाव भक्ति निधि पास ॥१२९॥
मुमुक्षु के लक्षण बता रहे हैं - सत्य, असत्य का विवेक, सत्शास्त्रों में श्रद्धा, ब्रह्मचर्य का परिपालन, यदृच्छा से जो कुछ मिल जाय उससे सन्तुष्ट रहना, सत्य बोलना, गुरु में श्रद्धा, भगवान् की भक्ति और उसका ध्यान आदि विरक्त मुमुक्षु के लक्षण हैं ।
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ब्रह्म शून्य तहँ ब्रह्म है, निरंजन निराकार ।
नूर तेज तहँ ज्योति है, दादू देखणहार ॥१३०॥
जिसको आत्मा का साक्षात्कार हो गया है, उसके लक्षण बता रहे हैं । निरजंन निराकार ब्रह्म में स्थित रहने वाले साधक की ब्राह्मी स्थिति हो जाती है । उस समाधि में जीव उपाधि को त्यागकर ब्रह्म में लीन रहता है । अर्थात् जीव ब्रह्म की एकता हो जाती है । केवल साक्षिरुप से स्थित रहता है । अपने चैतन्य में स्वयं स्थित रहता है । आत्मा के राज्य में सुख से रमण करता है । आत्मा के सिंहासन पर बैठकर अपने से भिन्न किसी को नहीं देखता ।
विवेकचूड़ामणि में लिखा है :: "जब यह जीवात्मा जीव-ईश्वर के भेद-भ्रम को त्यागकर ब्रह्म को जान लेता है - यही ब्रह्मज्ञान कहलाता है । दूध में घी की तरह, आत्मा को व्यापक मानकर सबके साक्षिरूप आत्मा को जानता है । वह कभी बन्धन में नहीं आता ।"
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मौजूद खबर, माबूद खबर, अरवाह खबर औजूद ।
मुकाम चिः चीज हस्त, दादनी सजूद ॥१३१॥
बीरबल ने फारसी भाषा में प्रश्न किये थे कि हे भगवान् ! देहाध्यासी पुरुष तथा आत्मज्ञान के जिज्ञासु पुरुष के और जिसने आत्मा को जान लिया है ऐसे ज्ञानी पुरुष के क्या लक्षण हैं ? कृपा करके मुझे बतावें ।
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औजूद मकामे हस्त - (देह अध्यासी के लक्षण)
नफ्स गालिब किब्र काबिज, गुस्सः मनी एस्त ।
दुइ दरोग, हिर्स हुज्जत, नाम नेकी नेस्त ॥१३२॥
महाराज अब बीरबल को उसके प्रश्नों का क्रमशः उत्तर दे रहे हैं -
देहाध्यासी के चित्त में विषय वासना की प्रबलता होती है । उनमें अहंकार, काम, क्रोध, भेदभावना, असत्य भाषण, भोगों की इच्छा, परस्पर कलह होता है । वे ईश्वर को याद भी नहीं करते । उनके चित्त में परोपकार की भावना भी कभी पैदा नहीं होती ।
(क्रमशः)

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