#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*जहाँ सुरति तहँ जीव है, जहँ नांही तहँ नांहि ।*
*गुण निर्गुण जहँ राखिये, दादू घर वन मांहि ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*आसै आसण का अंग ६४*
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कमठ१ कौडिला आडि अहि२, मरजीवा रू मराल३ ।
रज्जब जल निधि डूबि दैं४, लेहि जिनहिं जो ख्याल५ ॥२५॥
कछुवा१, कौडिला, आडि, सर्प२, हंस३ आदि जल के जीव और मरजीवा सभी समुद्र में डुबकी लगाते४ हैं किन्तु लाते वही वस्तु हैं जिसको जिसका ध्यान५ होता है, वैसे ही सभी साधन करते हैं किन्तु मिलता वही है जिसकी जो इच्छा होती है ।
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अहार औषधि, आस१ रम२, आवै भार अठार ।
मधु३ मडचर४ मेला मनहु, रज्जब रुचि व्यवहार ॥२६॥
भोजन मुख से चलकर पक्वाशय से जा मिलता है, औषधि भी मुख में चलकर रोग से जा मिलती है । अठरह भार वनस्पतियों का शहद३ सब वृक्ष में रमता हुआ२ फूल में जा मिलता है, मक्खन४ दूध दही में रमता हुआ फेन से जा मिलता है, मन सब ठौर रमता हुआ जिसकी आशा१ होती है वहाँ ही जा मिलता है, वैसे ही सबका मिलन रूप व्यवहार रुचि अनुसार ही होता है ।
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पहुप पत्र समदी१ सहद, औषधि फल अरु आग ।
गूंद दूध गुठली छाया, भाव भूख२ तिहिं लाग ॥२७॥
पुष्प, पत्ता, प्रेमी१, शहद, औषधि, फल, अग्नि, गूंद, गुठली, छाया ये सब जहाँ इनके लगने का भाव होता है और जहाँ इच्छा होती है वहाँ ही लगते हैं । पत्ते, पुष्प, शहद फल, गूंद गुठली, वृक्ष में वहाँ ही लगते हैं जहाँ लगते आये हैं, औषधि रोग पर ही लगती है, दूध कुचों में ही आता है, देवादि की छाया जिसमें आती है उसी में आती है, दीपक राग का अग्नि दीपक की बत्ती में ही लगता है, समदी भी वहाँ ही जाता है जहाँ उसका भाव हो, वैसे ही जीवात्मा की जिसमें प्रीति और इच्छा२ होती है, देह छोड़कर उसी के पास जाता है ।
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अपनी अपनी चूणि१ को, चौरासी चेतन्न ।
रज्जब ले सो मांड में, जो है जा के मन्न ॥२८॥
ब्रह्माण्ड में रहने वाले चौरासी लाख योनियों के सभी जीव अपने अपने चुगे१ के लिये सावधान है और जो जिसके मन में बसा है, उसी को वह ग्रहण करता है, वैसे ही प्राणी देह छोड़कर उसी को ग्रहण करता है जिसमें उसका प्रेम है ।
(क्रमशः)

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