#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*निगुणा का अँग ३३*
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कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ ।
दादू माँहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥१०॥
ब्रह्म रूप सँत और कृतघ्नी जीव को चाहे कोटि वर्ष तक साथ रखो, तो भी कृतघ्नी के भीतर भोग - वासना रहने से उसे कभी भी ब्रह्म प्राप्ति नहीं हो सकती ।
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कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ ।
दादू माँहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥१०॥
ब्रह्म रूप सँत और कृतघ्नी जीव को चाहे कोटि वर्ष तक साथ रखो, तो भी कृतघ्नी के भीतर भोग - वासना रहने से उसे कभी भी ब्रह्म प्राप्ति नहीं हो सकती ।
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*सगुणा निगुणा कृतघ्नी*
मूसा जलता देखकर, दादू हँस दयाल ।
मानसरोवर ले चल्या, पँखां काटे काल ॥११॥
११ - १३ में सुगुणी और दैवी गुण रहित कृतघ्नी का परिचय दे रहे हैं - एक चूहा अग्नि के घेरे में आकर जलने वाला ही था कि एक दयालु हँस ने उसे वहां से उठाकर अपनी पीठ पर रखा और मानसरोवर को चल दिया, किन्तु कृतघ्नी चूहे ने उसी के पँख काटना आरँभ कर दिया । ऐसे ही दयालु सँत त्रिताप से जलते हुये जीव को उपदेश द्वारा उठा कर भगवान् की ओर ले जाते हैं, तब वह कृतघ्नी जीव उन्हीं के उपदेश का खँडन करने लगता है ।
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सब जीव भुवँगम कूप में, साधू काढ़े आइ ।
दादू विषहरि विष भरे, फिर ताही को खाइ ॥१२॥
जैसे कूप में पड़े हुये सर्प को कोई भला मानव निकालता है तो वह उसे ही खाने को तैयार होता है । वैसे ही सभी कृतघ्नी सँसारी जीव विषय - वासना रूप विष से भरे हुये सँसार - कूप में पड़े हैं, उन्हें सँत उपदेश द्वारा निकालने का उद्योग करते हैं तो वे उलटे उन्हें ही व्यथित करने में प्रवृत्त होते हैं ।
(क्रमशः)

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