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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १६. राग सोरठ =*
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(७/१)
*हमारै साहु रमइया मौटा,*
*हम ताके आहि बनौटा ॥टेक॥*
*यह हाट दई जिनि काया,*
*अपना करि जांनि बैठाया ।*
*पूंजी कौ अंत न पारा,*
*हम बहुत करी भंडसारा ॥१॥*
*लई बस्तु अमोलक सारी,*
*सब छाडि बिषै षलि षारी ।*
*भरि राष्यौ सब ही भैंना,*
*कोई षाली रह्यौ न कौंना ॥२॥*
आध्यात्मिक सिद्ध ही राम तक पहुँचाने में समर्थ – हमारे इस आध्यात्मिक व्यापार का सर्वोच्च नियन्त्रक राम प्रभु हैं । हम तो उसके एक छोटे कारिन्दा के रूप में साधारण आध्यात्मिक व्यापारी हैं ॥टेक॥
उस व्यापार के लिये हमारा यह शरीर ही दुकान है । मालिक(नियन्त्रक) अपना आदमी समझकर इसका उत्तरदायित्व हमको सौंपा है । इस दुकान में व्यापार में लगी हुई पूँजी का कोई अंत नहीं है । विक्रय हेतु इसमें रखी गयी वस्तुओं की भी कोई सीमा नहीं है । हमने इसमें बहुत समान एकत्र कर लिया है ॥१॥
इसमें निहित सभी वस्तुएँ अमूल्य हैं । हमने व्यर्थ की वस्तुओं को इस दूकान से दूर ही रखा है । मूल्यवान वस्तुओं से ही समस्त दुकान भरी पड़ी है । इसका कोई एक कोना भी खाली नहीं है ॥२॥
(क्रमशः)

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