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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज,श्री दादूद्वारा बगड,झुंझुनू ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
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नमाज सिजदा
दादू हौज हजूरी दिल ही भीतरि, गुसल हमारा सारं ।
उजू साजि अलह के आगे, तहाँ नमाज गुजारं ॥२२६॥
दादू काया मसीत कर पंच जमाती, मन ही मुल्ला इमामं ।
आप अलेख इलाही आगे, तहँ सिजदा करे सलामं ॥२२७॥
दादू सब तन तसबी कहै करीमं, ऐसा करले जापं ।
रोजा एक दूर कर दूजा, कलमा आपै आपं ॥२२८॥
दादू आठों पहर अलह के आगै, इकटक रहिबा ध्यानं ।
आपै आप अर्श के ऊपर, जहाँ रहै रहमानं ॥२२९॥
प्रभु प्रेमरूपी अमृत से भरा हुआ मेरा हृदय ही दर्शनरूप स्नान करने के लिए शुद्ध सरोवर है । पञ्चविषयों से रहित पाँच ज्ञानेन्द्रियों को शुद्ध करना ही प्रक्षालनकर्म(उजू) है ।
न केवल दोनों हाथ-पैर और मुंह धो लेना ही प्रक्षालनकर्म है । मैं तो, उन इन्द्रियों को पवित्र कर, उपासना करता हूँ और मेरी ये पाँचों इन्द्रियाँ ही प्रार्थना में सहायकरूप(जमाती) है और मेरा मन ही प्रधान प्रर्थना करनेवाला(बांग मारने वाला) मुल्ला है । वहीं पर मैं उपासना करता हूँ ।
इसलिए हे मुसलामानों ! तुम इस शरीर को ही माला बना कर उस दयालु परमात्मा का भजन करो । सब प्राणियों को एक भाव से देखना ही व्रत(रोजा) रखना है ।
स्वस्वरूप में स्थित रहना ही मन्त्र(कलमा) पढ़ना है । इस प्रकार की उपासना विधि के अपनाने से तुम भी मुक्त हो जाओगे । मरणपर्यन्त दिन रात प्रभु का ध्यान करना चाहिये । अपने मन को विषयों की तरफ जाने के लिये कुछ भी मौका नहीं देना चाहिये ॥२२६-२२९॥
(क्रमशः)

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