मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

= *आसै आसण का अंग ६४(९/१२)* =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐 
*मन मनसा का भाव है, अन्त फलेगा सोइ ।*
*जब दादू बाणक बण्या, तब आशय आसण होइ ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*आसै आसण का अंग ६४*
आसै१ आसण होत हैं, जहाँ रचै२ हित भाय३ । 
देखो दीपक राग की, अग्नि सु दीवै जाय ॥९॥ 
देखो, दीपक राग गाने से उत्पन्न होने वाला अग्नि दीपक बत्ती में ही प्रगट होता है, बीच में रूई के पहल पड़े हो तो भी उनमें नहीं प्रगट होता, वैसे ही प्राणी जिसमें प्रेम - भाव३ से अनुरक्त२ होता है उस प्रेम१-पात्र के पास ही जा बसता है । 
रज्जब मत को मत१ मिले, ज्यों जड़ टूटी आल२ । 
दिन्हों३ पड़ै दूजे नहीं, जे बीतैं बहु काल ॥१०॥ 
जैसे आल२ वृक्ष की जड़ टूट जाय वा आली२ भूमि में किसी वृक्ष की जड़ टूट कर रह जाय तो कुछ दिनों३ का अंतर पड़ने पर भी वह दूसरी नहीं बनती, उससे उसी वृक्ष के पत्ते नकलते हैं जिसकी जड़ वह होती है, वैसे ही प्राणी किसी कारण से अपने सिद्धान्त से हट जाय तो भी अपना सिद्धान्त मिले तभी उस सिद्धान्त में मिलता है, नहीं तो यदि बहुत सा समय व्यतीत हो जाय वह बिना प्रीति अन्य में नहीं मिलता । 
शरीरहीं सूंघे नहीं, औषिध रोग हिं जाय । 
त्यों आसै१ आसण होत है, नर देखो निरताय२ ॥११॥ 
हे नरो ! विचार२ करके देखो, औषधी शरीर को नहीं सूंघती, वह तो सीधी रोग पर जाती है, वैसे ही जहाँ वासना१ होती है वहाँ ही प्राणी जा बसता है । 
ब्रह्म सुमिरतों माया लहिये, माया खर्चत राम । 
रज्जब समझा ज्ञान में, भाव भेद का काम ॥१२॥ 
एक तो ब्रह्म का स्मरण करते हुए भी माया में प्रेम होने से माया को ही प्राप्त करता है और एक का राम में प्रेम होने से माया को खर्च करके राम को प्राप्त करता है, हम समझ गये उनके ज्ञान को, उनका भाव भिन्न-भिन्न होने से ऐसा काम होता है । 
(क्रमशः)

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