मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

= १३९ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू कहतां कहतां दिन गये, सुनतां सुनतां जाइ ।*
*दादू ऐसा को नहीं, कहि सुनि राम समाइ ॥*
=============================
साभार ~ satsangosho.blogspot.com

भट्टो जी दीक्षित बंगाल के एक बहुत अदभुत व्याकरणाचार्य हुए हैं। वे साठ वर्ष के हो गये। उनके पिता उन्हें बार—बार कहते कि तू व्याकरण में ही उलझा रहेगा? अरे, अब मंदिर जा, अब प्रभु को नमस्कार कर, पुकार प्रभु को ! अब तू भी बूढ़ा होने लगा। पिता तो कोई अस्सी साल के हो गये थे। लेकिन यह बेटा सुनता —न था।
.
यह सुन लेता, हंस लेता, टाल जाता। लेकिन एक दिन पिता ने कहा कि सुन, अब मुझे लगता है कि मेरी आखिरी घड़ी करीब आ रही है। और मेरे मन में एक दुख रह जाएगा कि तू मेरे देखते —देखते कभी मंदिर न गया, तूने कभी प्रभु का स्मरण न किया। छोड़ यह बकवास, यह व्याकरण में क्या रखा है? इस लिखने—पढ़ने में क्या धरा है? तू प्रभु को तो याद कर !
.
भट्टो जी दीक्षित ने कहा कि अब आप मानते नहीं तो मुझे आपसे कहना पड़े। आपको मैं भी देख रहा हूं वर्षों से मंदिर जाते, लेकिन मैंने अभी तक देखा नहीं कि आपने नमस्कार किया हो। क्योंकि आप रोज वैसे के वैसे वापिस लौट आते हैं। नमस्कार के बाद कोई वापिस लौटता है? वैसा का वैसा वापिस लौटता है? पहले तो वापिस ही नहीं लौटना चाहिए, अगर नमस्कार हो गया है। और अगर लौटे भी तो कुछ दूसरा होकर लौटना चाहिए। चालीस—पचास साल से तो मुझे भी याद है, जब से मैंने होश संभाला है, आपको देख रहा हूं सुबह—शाम मंदिर जाते; मगर कोई क्रांति की किरण नहीं दिखी।
.
तो मैंने सोचा, ऐसा नमस्कार करके मैं भी क्या कर लूंगा? मेरे पिता कुछ न कर पाये तो मैं क्या कर लूंगा? जाऊंगा एक दिन, लेकिन कहे देता हूं बस एक बार याद करूंगा। और आप तो जानते हैं, मैं व्याकरण के पीछे पागल हूं। तो उसने कहा कि राम—राम क्या कहना, एक बार रामा: बहुवचन कह देंगे, खतम हुआ। बार—बार राम—राम, राम—राम कहते रहना, जिंदगी भर एकवचन कहने से क्या सार है? बहुवचन में ही एक दफा कह देंगे।
.
समझ लेगा समझ लेगा; नहीं समझा, बात खतम हो गयी। दुबारा कुछ कहने को बचा नहीं। और एक दिन वह गये और एक बार रामा: कहा और वहीं गिर गये। उड़ गये प्राण—पखेरू। घड़ी भर बाद लोगों ने आ कर घर खबर दी पिता को कि आप क्या बैठे कर रहे हैं, आपका बेटा तो जा चुका। सारा गांव इकट्ठा हो गया कि जो कभी मंदिर में न आया था, एक बार आ कर राम को एक बार पुकार कर अनंत यात्रा पर निकल गया ! मामला क्या हुआ?
.
पिता रोने लगे। पिता ने कहा, वह ठीक ही कहता था कि एक ही बार कहूंगा, लेकिन पूरे प्राण से कह दूंगा। पूरा—पूरा कह दूंगा, सब लगा कर कह दूंगा। ऐसा रत्ती—रत्ती, रोज—रोज दोहराना—क्या सार है !
और अक्सर ऐसा होता है कि रोज—रोज दोहराने से, रत्ती—रत्ती दोहराने से दोहराने की आदत हो जाती है। यंत्रवत दोहराये चले जाते हैं। लोग बिलकुल यंत्रवत झुकते हैं; मंदिर देखा, झुक गये। इसमें कुछ भी अर्थ नहीं है। कोई प्रयोजन नहीं है। बचपन से बंधी एक यांत्रिक आदत है।
.
ईश्वर की धारणा भी लोगों की बड़ी संकीर्ण है। नमस्कार करते हैं तो उसमें भी हिसाब रखते हैं। नमस्कार का तो अर्थ ही होता है बेहिसाब। यह जो चारों तरफ विराट मौजूद है, इसमें झुकें, इसमें नदी की तरह लीन हो जाओ, जैसे नदी सागर में खो जाती है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें