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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १६. राग सोरठ =*
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(७/२)
*जो गाहक लेने आवै, मन मान्यौ सौदा पावै ।*
*देषै बहु भांति किरांना, उठि जाइ न और दुकांना ॥३॥*
*सम्रथ की कोठी आये, तब कोठीवाल कहाये ।*
*बनिजै हरि नांव निवासा, यह बनिया सुंदरदासा ॥४॥*
जो भी ग्राहक कोई वस्तु खरीदने आता है, वह मनचाही वस्तु यहाँ पा ही जाता है । दूसरे व्यापारी भी इस दुकान पर बहुत गहरी दृष्टि रखते हैं । उन्हें यह भय सताता रहता है कि कहीं इसके कारण उनकी दुकान चौपट न हो जाय ॥३॥
समर्थ(आध्यात्मिक) व्यापारी का साथ पकड़ कर हमने यह कोठी(दुकान) खोली । तब हम इस बाजार में ‘कोठीवाल’(बड़े व्यापारी) कहलाये । हम इसमें भगवान् का नाम एवं उनका निवास स्थान बताने का ही कार्य करते हैं । इसीलिये हमारा नाम “बनियाँ सुन्दरदास” ही प्रसिद्ध हो गया है ॥४॥
(क्रमशः)

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