सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

= सुन्दर पदावली(१६.राग सोरठ - ७/२) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १६. राग सोरठ =*
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(७/२) 
*जो गाहक लेने आवै, मन मान्यौ सौदा पावै ।* 
*देषै बहु भांति किरांना, उठि जाइ न और दुकांना ॥३॥* 
*सम्रथ की कोठी आये, तब कोठीवाल कहाये ।* 
*बनिजै हरि नांव निवासा, यह बनिया सुंदरदासा ॥४॥* 
जो भी ग्राहक कोई वस्तु खरीदने आता है, वह मनचाही वस्तु यहाँ पा ही जाता है । दूसरे व्यापारी भी इस दुकान पर बहुत गहरी दृष्टि रखते हैं । उन्हें यह भय सताता रहता है कि कहीं इसके कारण उनकी दुकान चौपट न हो जाय ॥३॥ 
समर्थ(आध्यात्मिक) व्यापारी का साथ पकड़ कर हमने यह कोठी(दुकान) खोली । तब हम इस बाजार में ‘कोठीवाल’(बड़े व्यापारी) कहलाये । हम इसमें भगवान् का नाम एवं उनका निवास स्थान बताने का ही कार्य करते हैं । इसीलिये हमारा नाम “बनियाँ सुन्दरदास” ही प्रसिद्ध हो गया है ॥४॥
(क्रमशः)

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