मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग २३०/२३४

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
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साधु महिमा महात्म
दादू अट्ठे पहर इबादती, जीवण मरण निबाहि ।
साहिब दर सेवै खड़ा, दादू छाड़ि न जाहि ॥२३०॥
अट्ठे पहर अर्श में, ऊभोई आहे ।
दादू पसे तिनके, अल्लह गाल्हाये ॥२३१॥
अट्ठे पहर अर्श में, बैठा पीरी पसन्नि ।
दादू पसे तिन्न के, जे दीदार लहन्नि ॥२३२॥
अट्ठे पहर अर्श में, जिन्हीं रूह रहन्नि ।
दादू पसे तिन्न के, गुझ्यूं गाल्हि कन्नि ॥२३३॥
अट्ठे पहर अर्श में, लुड़ींदा आहीन ।
दादू पसे तिन्न के, असां खबर डीन ॥२३४॥
निरंतर प्रभु के द्वार पर खड़े रह कर उसी का ध्यान करो । उस ध्यान में कोइ व्यवधान न पड़ने पावे । इस प्रकार जो प्रभु ही का ध्यान करता है उसको ही उसका दर्शन होता है । भक्तजन अपने विशुद्ध अंतःकरण में आठों पहर स्वचित्तवृत्ति द्वारा भगवन के सम्मुख स्थित होकर प्रभु से संवाद करते हैं । ऐसे साधकों का, अपनी कल्याणकामना से, दर्शन करना चाहिये । जिन्होंने उस परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया, वे प्रभुदर्शन करते हुए प्रसन्न हो रहे हैं । वे स्वयं दिनरात आठों पहर उसी का दर्शन करते हैं और दूसरों को उसकी भक्ति के लिए प्रेरित करते हैं ।
भागवत में भी लिखा है - “हे राजन बड़े बड़े ऋषि मुनि या देवता अपने अंतःकरण को भगवन्मय बना कर उसे खोजते रहते हैं । भगवन के ऐसे चरणकमलों से आधे क्षण भी जो नहीं हटता, निरंतर उन चरणों की सेवा में ही लगा रहता है । यहाँ तक कि कोई स्वयं उसे त्रिलोकी की राज्यलक्ष्मी दे तो भी वह भगवत्स्मृति का तार(निरन्तरता) नहीं तोड़ता । ऐसा ही महापुरुष भगवन का मुख्य भक्त है ।”
“विवशता से नामोच्चारण करने पर भी सम्पूर्ण पापों का नाश करनेवाले स्वयं भगवन हरी जिसके ह्रदय को क्षण भर भी नहीं छोड़ते, क्यों की उसने प्रेम की रस्सी से उनके चरणकमलों को बाँध रक्खा है । ऐसे पुरुष ही भक्तों में श्रेष्ठ माने जाते हैं ।”
“कुसंग का सर्वथा त्याग करना ही उचित है । यदि किसी कारण से वह छोड़ा न जा सके तो उसको सज्जनों के साथ जोड़ना चाहिये क्यों कि सत्संग ही भवरोग की एकमात्र औषधि है”॥२३०-२३४॥
(क्रमशः)

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