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*बिन रसना मोहन गुण गावै,*
*नाना वाणी अनुभव अपरा ।*
*दादू अनहद ऐसे कहिये,*
*भक्ति तत्त यहु मारग सकरा ॥*
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साभार ~ Osho Amrutvaani
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सुख केवल दुख का विस्मरण है, और आनंद आत्मा का स्मरण है। मनुष्य होश की जो छोटी सी किरण है उसे खोकर सुख खरीदता है। बेहोश करने के उपाय इतने सुगम है कि मनुष्य को पता भी नही चलता, मनुष्य उनसे इतना ज्यादा ग्रस्त है कि उसे विचार ही नही आता। ये सब स्वयं से बचने की विधियां हैँ।
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जब कोई महत्वाकांक्षा नहीँ। न राजनीति करनी है। न धन कमाना है। न पद-प्रतिष्ठा अर्जित करनी है, फिर मनुष्य स्वयं से कैसे बच सकेगा? मनुष्य यदि समझेगा तो देखेगा कि वह आत्मा को जानने से बचने का सारा उपाय करता है।
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विकल्प स्वप्न है। चित्त का विकल्पोँ से भरे रहना स्वप्न की दशा है। ये न सोचे मनुष्य कि वो केवल रात मे ही स्वप्न देखता है, वो दिन मे भी देखता रहता है। मनुष्य के भीतर चौबीसोँ घंटे एक अंतर्धारा स्वप्न की बनी रहती है। स्वप्न रात का अंधकार हो और आँखे बंद हो तो सुगमता से दिखाई देते हैँ। दिन मे आंखे खुली हैँ, पच्चीस और कार्य करने हैँ। दिन मे भी आराम से आंख बंद करके बैठने पर स्वप्न शुरु हो जाते हैँ।
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इस अंतर्धारा को तोड़ना आवश्यक है। दिन में इसे मनुष्य तोड़ सके तभी रात में तोड़ सकेगा। सभी मंत्रों का उपयोग इसे तोड़ने के लिये है। स्वप्न की अंतर्धारा को तोड़ने मे मंत्र उपयोगी है। कैसे? यदि कार्य करते समय मंत्र की अंतर्ध्वनि चलने दी जाए तो जो शक्ति स्वप्न बनती थी, स्वप्न की धारा बनती थी वही मंत्र की धारा बन जाएगी। तब भीतर मनुष्य ने एक अपना ही सपना पैदा कर लिया।
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बाहर वो कार्य मे लगा रहता है और भीतर मंत्र का अनुसरण करता है। जो शक्ति सपना देखती थी वही मंत्र का स्मरण बन जाएगी। जिस क्षण रात नीँद मे सपना न चले बल्कि मंत्र की धारा चले उस क्षण मनुष्य समझ ले कि दिन का स्वप्न टूट गया। यदि स्मरण गहरा हो जाए तो स्वप्न के स्थान पर मंत्र की धारा चलने लगती है।
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किसी भी उस शब्द को जिससे परमात्मा का बोध होता है यदि लगातार दोहराया जाए तो उसका एक संगीत भीतर पैदा हो जाता है, एक ध्वनि पैदा हो जाती है। मंत्र स्वप्नों को नष्ट करने का उपाय हैँ। उनसे कोई भी परमात्मा को नही पाता। परन्तु स्वप्न को नष्ट करना परमात्मा को पाने के मार्ग पर बड़ा कदम है।
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सपने क्या हैँ? शब्द हैँ। इसलिये शब्दोँ की हथौड़ी ही उन्हे चकनाचूर कर सकती है। नकली है, परन्तु काम करेगी। नकली बीमारी के लिये नकली औषधि ही उचित होती है, क्योँकि वही उसे नष्ट करेगी। स्वप्न क्या है? विकल्प है।
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और मंत्र क्या है? मंत्र संकल्प है। संकल्प विकल्प का ही एक रुप है। परन्तु स्वप्न लगातार बदल रहे हैं, क्षणभंगुर है। मंत्र सतत और एक ही है। धीरे- धीरे सभी स्वप्नो की ऊर्जा मंत्र मे लीन हो जाती है। जिस क्षण रात मे स्वप्न के स्थान पर मंत्र की धारा चले मनुष्य समझ ले कि उसने स्वप्न पर विजय पा ली है। सपना टूटा,सत्य शुरु हुआ।
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अब सुषुप्ति मे प्रवेश आसान है। परन्तु मनुष्य विकल्पोँ को शक्ति देता है। भीतर व्यर्थ के विचार चलते हैँ उनको भी सहयोग देता है। धन के सपने, साम्राज्य के सपने, शक्ति के सपने, और इन्हे मनुष्य पा भी ले तो क्या मिलेगा? जो लोग सपनो को पूरा करने मे सफल हो जाते हैँ उनसे ज्यादा असफल व्यक्ति खोजना कठिन है क्योँकि सफलता के अंतिम क्षणोँ मे उन्हे ज्ञात होता है कि हाथ खाली ही रह गए।
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यद्यपि वे अपनी मूढ़ता को अपनी सफलता की आड़ मे छिपा लेते हैँ। क्योँकि ये अहंकार के विपरीत है कि वे कहें कि हमे कुछ मिला नही। यदि सभी सफल ईमानदारी से कह देँ कि ये सफलता भ्रम है तो बहुत से व्यर्थ सपनो की दौड़ बंद हो जाए।

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