#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*मीठे सौं मीठा भया, खारे सौं खारा ।*
*दादू ऐसा जीव है, यहु रंग हमारा ॥*
===============
**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
.
*आसै आसण का अंग ६४*
.
माया मांही ब्रह्म पाइये, ब्रह्म मध्यतैं माया ।
फलै सु मन की कामना, रज्जब भेद सु पाया ॥१३॥
ब्रह्म प्राप्ति की कामना हो तो माया ब्रह्मार्पण करने से माया में रहते हुये भी ब्रह्म प्राप्त होता है और माया प्राप्त करने की कामना हो तो ब्रह्म के स्मरण में लीन रहने पर भी माया मिलती है, प्राणी के मन की कामना के अनुसार ही फल मिलता है यह रहस्य हमने जान लिया है ।
.
सब जीव माया ब्रह्म मध्य, उभय आतमा पूरि१ ।
रज्जब दूर जु२ दिल नहीं, हिरदै हित३ सु हजूरि४ ॥१४॥
सभी जीव माया तथा ब्रह्म के बीच में हैं, और माया तथा ब्रह्म दोनों सभी जीवात्माओं में परिपूर्ण१ रूप से भरे हुये हैं, जो२ दिल में नहीं है, वह उससे दूर है और जिसका प्रेम३ हृदय में है वह पास ही स्थित४ है ।
.
माया मिल माया भये, ब्रह्म मांहि तैं जंत५ ।
यूं जीव शिव१ सब शक्ति२ मधि, प्राण पलटणा३ मंत४ ॥१५॥
सब जीव५ ब्रह्म में थे किन्तु ब्रह्म से निकल कर माया में मिलने से माया रूप हो गये है, माया२ के मध्य और जीव हैं, वे उक्त प्रकार माया से निकल कर ब्रह्म१ से मिलने पर ब्रह्मरूप हो जाते हैं, यही प्राणी के बदलने३ का सिद्धान्त४ है, जिसमें प्रीति होगी उसी में जा मिलेगा ।
.
शिव१ को मिलै तु शक्ति२ मध्य, शक्ति मिलत शिव मांहि ।
आसै३ आसण४ जीव का, जुगल सु विछुटै नांहि ॥१६॥
मैं ब्रह्म१ को प्राप्त हो गया ऐसा कहने पर भी यदि जीव की प्रीति माया में हो तो वह माया२ में ही है और माया मिलने पर भी जीव की प्रीति ब्रह्म में हो तो वह ब्रह्म में ही है, जहां जीव की प्रीति३ होती है, वह वहां ही रहता४ है, किन्तु माया और ब्रह्म दोनों जीव से अलग नहीं होते ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें