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*हंस गियानी सो भला, अंतर राखै एक ।*
*विष में अमृत काढ ले, दादू बड़ा विवेक ॥*
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साभार ~ Rp Tripathi
**सफल व्यक्तित्व का निर्माण कैसे करें ? :: एक संक्षिप्त चिंतन**
सम्मानित मित्रों बहुत संक्षिप्त में;
जिस प्रकार सोने के आभूषणों को मूल्यवान बनाने के लिए; सोने का चोखा होना परमावश्यक है; उसी प्रकार सफल-व्यक्तित्व के निर्माण लिए; मन अर्थात् विचारों का चोखा अर्थात् विवेक-युक्त सोच के साथ होना परमावश्यक है ..!!
अतः हमारे विचार कैसे विवेक-युक्त रहें ? आइये इस आलेख में इस विषय पर हम संक्षिप्त चिंतन करें :--
मित्रों सोच दो प्रकार की होती है :--
एक सामान्य-सोच और दूसरी विवेक-युक्त सोच !! तथा व्यक्ति में जिस सोच की प्रधानता होती है; वह उसी के अनुसार अपनी व्यक्तिगत जीवन-शैली व्यतीत कर अपने व्यक्तित्व का निर्माण करता है !!
मित्रों आइये पहले हम अपनी सामान्य-सोच का उदाहरण लेते हैं :--
सामान्य सोच वह है :--
जिसमें हम फलेक्षा के साथ कार्य करते हैं !! अर्थात् कार्य करने के बाद; उसके परिणाम से इच्छित-सुख की आशा करते हैं ..!! और इस विधि से कार्य करने से हमें कुछ ग़लत भी नज़र नहीं आता ..!!
जैसे :--
महीने भर कार्य करने के बाद; महीने के अंत में तनख़्वाह की आशा का सुख !! भला करने पर; धन्यवाद की आशा का सुख !! व्रत उपवास देवपूजन आदि के बाद; इच्छित-फल प्राप्ति की आशा का सुख !! जीवन भर अच्छे कर्म करने के बाद; स्वर्ग-प्राप्ति की आशा का सुख ..!! आदि; आदि ..!!
आइये इस सामान्य-सोच की अब हम थोड़ी गहराई से विवेचना करें :--
मित्रों जब भी हम आशा के साथ करेंगे , तो केवल दो बातें ही होंगी :-- या तो हमारी आशा की पूर्ति होगी; या नहीं होगी !!
परन्तु सम्मानित मित्रों;
दोनों स्थितियों में ही आशा की पूर्ति की सोच के साथ कार्य करना , स्वयं तथा वातावरण के लिए अहितकर है ..!! परन्तु इसकी समझ हमें , अपने स्वयं जीवन के अनुभवों का गहराई से विश्लेषण किये बग़ैर; नहीं आती ..!!
यदि हम अपने अनुभवों का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि : -- जब-जब भी हमारी आशा की पूर्ति नहीं हुई; तब-तब हमें क्रोध आया !! और जब-जब आशा की पूर्ति हुई; तब-तब हमारे अंदर -- मद और लोभ आये !! और इन तीनों ने मिलकर हमारी स्वांशों को बेचैनी की बना दिया ..!!
अर्थात् हमारे व्यक्तित्व को असफल बना दिया; क्योंकि बेचैनी की स्वांशों के साथ जीना ही असफल व्यक्तित्व की निशानी है ..!!
अब मित्रों विवेक-युक्त-सोच का उदाहरण लेते हैं :--
विवेक युक्त सोच वह है :--
जो फ़ैक्टरी सेटिंग के अनुरूप है !! क्योंकि यह सेटिंग मन के निर्माता द्वारा निर्देशित है; जो किसी भी उपकरण की भाँति; उससे उच्चतम-कुशलता से कार्य लेने के लिए परमावश्यक है !!
और मित्रों जब हम अपने मन की फ़ैक्टरी सेटिंग के विषय में चिंतन करते हैं तो पाते हैं कि :--
"जो भी कर्म या विचार हमारे शरीर-मन से सम्पादित होते हैं , वह सदैव वर्तमान-काल में ही सम्पादित होते हैं !! भूत या भविष्य में जाकर यह दोनों कभी कोई कार्य कर ही नहीं सकते ..!! क्योंकि यह सिर्फ़ वर्तमान की स्वाँस से ही ज़िंदा या कार्यशील रहते हैं ..!"
"इसी कारण आज तक हम में से जीवन में कभी भी किसी को भी; भूत भूत के रूप में; और भविष्य भविष्य के रूप में नहीं मिले ..!! जब भी इनसे मुलाक़ात हुई; हमेशा वर्तमान के रूप में ही हुई ..!!"
अब मित्रों चिंतन का विषय यह है कि :--
जब भी हम कर्म सुख की प्राप्ति अर्थात् फलेक्षा की कामना के साथ करते हैं; तो सुख की प्राप्ति तो कार्य करने के बाद; अर्थात् भविष्य-काल में प्राप्त होगी ..!! जिस भविष्य की भविष्य के रूप में हमसे कभी मुलाक़ात होगी ही नहीं; जब भी होगी वर्तमान के रूप में ही होगी; अतः हम चिंतन की गहराई के अभाव में सुख से सदैव के लिए वंचित हो जाते हैं ..!!
अतः समझदारी इसी में है कि हम;
"विवेक-युक्त सोच के साथ जीवन यापन करें !! अर्थात् भूत भविष्य नहीं; वर्तमान की ओर ध्यान दें ..!! वर्तमान में सुख की आशा से नहीं; वरन सुखी रहकर कार्य करें ..!!"
दूसरे शब्दों में;
"हमारे कर्म और विचार; दोनों सुख की अभिव्यक्ति हों ..!! यह दोनों आनंद प्रगट करने के माध्यम बनें !! छोटे से छोटे और बड़े से बड़े कार्य और विचार दोनों; आनंद की अभिव्यक्ति हों ..!!"
चलें; तो ख़ुशी से !!
बैठें; तो ख़ुशी से !!
बोलें; तो ख़ुशी से !!
विचार करें; तो ख़ुशी से ..!!
अर्थात् जो भी करें; अंदर की ख़ुशी या आनंद रूपी झरने के जल को अभिव्यक्त करने के लिये करें ..!!
जिस तरह झरने का जल,
अंदर के जल-श्रोत की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है; जिस पर बाहर में हो रही वर्षा या सूखे का कोई असर नहीं होता; उसी तरह हम बाह प्रतिक्रियाओं अर्थात् प्रशंसा तथा निंदाओं से विक्षेपित रहे वग़ैर; कार्य करें ..!!
इसे ही नेकी कर दरिया में डाल; या प्रेम का आचरण कहते हैं ..!!
अतः स्वयं ख़ुश रहें; और निरंतर ख़ुशी का संदेश ही फैलायें !! निरंतर सहजता से चैन की स्वांशों के साथ जीवन यापन करें ..!!
यही सफल व्यक्तित्व; या परमात्मा के निर्देश अनुसार विवेक-युक्त सोच के साथ जीवन जीने की शैली है ..!!
(क्योंकि इसके विपरीत सामान्य सोच के कारण; जब भी हम काम-क्रोध-लोभ-अहंकार आदि के वशीभूत हो दुःखी/असंतुष्ट होंगे; तो ना सिर्फ़ स्वयं का अहित करेंगे; वरन जिनके साथ रहते हैं; या जिन-जिन के सम्पर्क में आते हैं; उन सभी का भी अहित करेंगे ..!! क्योंकि फिर जिस तरह समुद्र में छोटी-बड़ी लहरें निकलती ही रहती हैं; उसी तरह हमारे अंदर से भी निरंतर दुःख/असंतुष्टि/शिकायतों की लहरें भी निकलती ही रहेंगी ..!!)
उपरोक्त से सहमत हैं ना मित्रों ?
********ॐ कृष्णम वन्दे जगत् गुरुम********

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