#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम ।**भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*आसै आसण का अंग ६४*
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इस ब्रह्मांड बजार में, बहुती वस्तु बणाव१ ।
जन रज्जब ले जीव सो, जाके जा सौं भाव ॥२९॥
इस ब्रह्माण्डरूप बाजार में बहुत सी वस्तुऐं सजाई१ हैं किन्तु जिस जीव का जिसमें प्रेम है, वह उसी वस्तु को लेता है, वैसे ही देह को छोड़कर उसी को प्राप्त होता है जिसमें प्रेम है ।
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रज्जब रामति१ राममें, बहुत भरे भंडार ।
पै आसै२ आसण अणसरै३, ता में फेर न सार ॥३०॥
राम जिसमें रम रहा है उस संसार१ में वस्तुओं के बहुत भण्डार भरे हैं किन्तु जीव अपनी वासना२ के अनुसार३ ही वस्तु को प्राप्त करता है, अन्य को नहीं । यही सार बात है, इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं है ।
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आसै१ आसण२ होयगा, जाका जहाँ करार३ ।
जन रज्जब जाणी जुगत४, ता में फेर न सार ॥३१॥
जिसमें जहाँ जाने की वासना१ रूप प्रतिज्ञा३ है उसका वहाँ ही निवास२ होगा, हमने यह युक्ति४ द्वारा जान लिया है, यही सार बात है यह बदल नहीं सकती ।
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रज्जब बुरी न वैद्य कन१, औषधि अकलि२ मंझार ।
पै रोगी राखै काम की, जा सौं ह्वै उपकार ॥३२॥
वैद्य के पास१ अनेक प्रकार औंषधियाँ रहती हैं, वे वैद्य की बुद्धि२ में कभी भी बुरी ज्ञात नहीं होती किन्तु रोगी तो जिससे उसका उपकार होता है वह अपने काम की औषधि ही रखता है, वैसे ही भगवान के विश्व रूप भण्डार में अनेक व्यक्ति तथा वस्तु हैं किन्तु प्राणी तो उसी को प्राप्त करता है जिसमें उसका प्रेम है ।
(क्रमशः)

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