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*दादू माया सौं मन रत भया, विषय रस माता ।*
*दादू साचा छाड़ कर, झूठे रंग राता ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com
'सारे धन कमा कर मनुष्य अतिशय भोगों को पाता है।’
भोग का फिर क्या अर्थ हुआ? ऐसा समझें।
विश्राम करना कोई छोटी—मोटी बात थोड़े ही है कि जब चाहा कर लिया। उसका भी जीवन में एक तारतम्य होना चाहिए। हर कोई थोड़े ही विश्राम कर सकता है। विश्राम के लिए एक गहरी कला होनी चाहिए कि अपने को विराम दे सकें। अपने मन को जब चाहें तब कह सकें कि बस' ठहर और मन ठहर जाये, तो विश्राम हो सकता है। मन को कभी ठहराया नहीं, ध्यान का कभी एक क्षण न जाना, प्रेम का कभी एक क्षण न जाना। प्रेम की फुर्सत कहां है?
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जिसको धन की दौड़ लगी है, उसको प्रेम की फुर्सत नहीं है। और धन का पागल प्रेम से बचता भी है। क्योंकि प्रेम में खतरा है। तो मनुष्य करीब—करीब साधन तो इकट्ठे कर लेते हैं, साध्य खो जाता है। और फिर जब सुख नहीं मिलता तो लोग बड़े हैरान होते हैं।
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वे कहते हैं, सब तो है, और सुख क्यों नहीं?
सुख का कोई संबंध धन से नहीं है, सुख का संबंध जीवन की किन्हीं और गहराइयों से है। क्षमताएं प्रखर होनी चाहिए; बोध गहरा होना चाहिए। जीने की कला आनी चाहिए। तब कभी रूखी रोटी में भी इतना स्वाद हो सकता है ! नहीं तो मिष्ठान्न भी, बहुमूल्य से बहुमूल्य भोजन भी व्यर्थ है। कभी रूखी—सूखी रोटी भी ऐसी तृप्ति दे सकती है, लेकिन तृप्ति की कला आनी चाहिए। वह बड़ी और बात है। धन के इकट्ठे करने से उसका कोई संबंध नहीं है।
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अक्सर तो धनी अविकसित रह जाता है। उसके जीवन की कलियां खिल नहीं पातीं, पंखुड़ियां खिल नहीं पातीं। एक ही दिशा में दौड़ने के कारण वह करीब—करीब और सब दिशाओं के प्रति अंधा हो जाता है। वह प्रत्येक में धन ही देखता है।

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