#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू तो पीव पाइये, भावै प्रीति लगाइ ।*
*हेजैं हरि बुलाइये, मोहन मंदिर आइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*आसै आसण का अंग ६४*
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रज्जब अज्जब भावना, करतों दीपक राग ।
तिनु तनु चीर न चाख१ ही, सो दीपक हीं लाग ॥२१॥
भावना बड़ी अदभुत है देखो, जो दीपक राग गाता है उसके शरीर के वस्त्र को तो नहीं जलाता१ और उससे प्रकट होने वाला अग्नि दीपक की बत्ती में ही जाकर लगता है ।
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माँगे मिलहि न शिव१ रू शक्ति२, मोल न लिये जाँहिं ।
रज्जब राखो लालसा३, आसण आसै४ माँहिं ॥२२॥
माया२ और ब्रह्म१ दोनों ही माँगने पर भी नहीं मिलते, मोल भी नहीं लिये जा सकते, मन में तीव्र इच्छा३ रखो, जिसको प्राप्त करने की तीव्र इच्छा४ होगी वही मिल जायेगा ।
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जो मति सो गति होयगी, साधु वेद सब साखि१ ।
मनसा वाचा कर्मना, जन रज्जब रुचि२ राखि ॥२३॥
संत तथा सब वेद इसी बात की साक्षी१ देते हैं कि - जैसी बुद्धि होती है, वैसी ही गति होती है, अत: जिसे प्राप्त करना चाहो, उसमें मन, वचन कर्म से प्रीति२ रक्खो ।
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शब्द शून्य१ सब ठौर, शक्ति२ सहित सांई३ रहै ।
रज्जब रुची४ शिर मौर, गाहन५ करि गाहक गहै ॥२४॥
आकाश१ में सभी ठौर शब्द रहता है, वैसे ही माया२ और ब्रह्म३ सब ठौर रहते हैं, उनको प्राप्त करने के लिये प्रीति४ ही शिरोमणि साधना है, जिसमें जिसकी प्रीति होती है वह उसका ग्राहक उसे खोज५ कर ग्रहण करता है ।
(क्रमशः)

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