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*दादू यहु मन पंगुल पंच दिन, सब काहू का होइ ।*
*दादू उतर आकाश तैं, धरती आया सोइ ॥*
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साभार ~ Soni Manoj
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🌾 पुनरुक्ति मत करो 🌿
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मनुष्य के जीवन में पाप और दुख की इतनी गहनता इसलिए है कि तुम खाली होने को जरा भी राजी नहीं । और जो खाली होने को राजी नहीं, वह कभी ध्यान को न पा सकेगा । और जिसने ध्यान न पाया, उसके जीवन में पुण्य की कोई संभावना नहीं । और जिसने पुण्य को ही न पाया, अनाश्रव तो बहुत दूर है । जो स्वर्ग को भी न पा सका,वह निर्वाण को कैसे पा सकेगा ।
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दौड़ते रहते हैं हम जिंदगी में, पुनरुक्ति की भांति । पुरानी कथा वही-वही दोहरती रहती हैं । कुछ बातें खयाल में ले लेना । एक, जीवन को पुनरुक्ति से बचाने की कोशिश करो । अन्यथा मरते वक्त तुम इतनी पुनरुक्ति की आकांक्षा लेकर मरोगे कि फिर दोहराते जाओगे । फिर यही रास्ते, फिर यही दुकानें, फिर यही बाजार, फिर यही घर, धन-दौलत, पत्नी, बच्चे, फिर यही खाते बही, फिर यही रोग, फिर यही दुख, सब पूरा का पूरा दोहरा जाएगा ।
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बुद्ध और महावीर दोनों ने बहुत जोर दिया है अपने साधकों के लिए कि वे पिछले जन्मों का स्मरण करें । सिर्फ एक कारण से, कि अगर पिछले जन्मों का स्मरण आ जाए, तो तुम्हें एक बात पता चलती है कि तुम पुनरुक्ति कर रहे हो । यही-यही तुम बहुत बार कर चुके हो । जैसे उसी फिल्म को फिर देखने चले गए ।
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मैं एक आदमी को जानता हूं, मेरे एक मित्र के पिता हैं । जिस गांव में रहते हैं, वहां एक टाकीज है । और उनके पास कोई काम नहीं । दिन में तीन शो होते हैं, वे तीनो शो देखते हैं । एक फिल्म पांच-सात दिन चलती है, वे पांच-सात दिन देखते हैं । एक दफा उनके घर मेहमान था । मैंने पूछा कि गजब कर रहे हैं आप ! एक ही फिल्म को दिन में तीन बार देख आते हैं । वे कहते हैं, कुछ करने को नहीं, घर में बैठे घबड़ा जाता हूं । चलो चल पड़े, टाकीज हो आए, देख आए । रोज उसी को देखते हैं पांच-सात दिन तक । उनको देख कर, उनके चेहरे को देखकर मुझे लगा, यह आदमी की हालत है । यही फिल्म तुम बहुत बार देख चुके हो । यही यश तुम बहुत बार मांग चुके हो । यही काम, यही क्रोध तुम बहुत बार कर चुके हो, नया कुछ भी नहीं है ।
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तो बुद्ध और महावीर दोनों ने ऐसी प्रक्रियाएं खोजीं, जिनके माध्यम से व्यक्ति अपने पिछले जन्मों के स्मरण में चला जाए । स्मरण आते ही भयंकर घबराहट पकड़ लेती है कि यह मैं क्या कर रहा हूं वही-वही ? वह तो हम भूल जाते हैं, तो सब लगता है फिर नया । फिर पड़े प्रेम में, फिर कोई पायल बोली फिर तुमने समझा कि ऐसा प्रेम तो कभी हुआ ही नहीं । हुए होंगे मजनू, फरियाद, हीर-रांझा, मगर मैं तो कभी नहीं हुआ । ऐसा प्रेम कभी नहीं हुआ । यह अनूठी घटना घट रही है ।
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तुम यह गोरखधंधा बहुत बार कर चुके हो । यह कुछ भी नया नहीं है । संसार बड़ा पुराना है । संसार सदा से प्राचीन है । इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो नया है । सूरज के तले कुछ भी नया नहीं । सब दोहरा रहा है । इस दोहराने की प्रतीति के ही कारण, इस देश में आवागमन से कैसे मुक्ति हो इसका भाव उठा । संसार में कहीं भी नहीं उठा । क्योंकि संसार में कहीं भी पिछले जन्मों को स्मरण करने की प्रक्रिया और मनोविज्ञान नहीं खोजा गया । इसलिए इस्लाम कहता है, एक ही जन्म है । इसाईयत कहती है, एक ही जन्म है ।
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बाकी सब धर्म भारत में पैदा हुए । जो धर्म भारत में पैदा हुए, वे कहते हैं, पुनर्जन्म है । अनंत श्रृंखला है । अनंत श्रृंखला के कारण भारत को एक बात समझ में आनी शुरू हुई कि यह तो पुनरुक्ति है, यह तो चाक का घूमना है । फिर वही आरे ऊपर आ जाते हैं, फिर नीचे चले जाते हैं, फिर ऊपर आ जाते हैं । बड़ी ऊब पैदा हो गयी । और जिस व्यक्ति को जीवन से ऊब पैदा हो जाए, वही जीवन से मुक्त होता है ।
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तो पुनरुक्ति मत करो । कल जो क्रोध किया था, काफी कर लिया, अब दुबारा मत करो । कल यश मांगा था, खूब मांग लिया, क्या पाया ? अब मत मांगो । कल तक धन के लिए दौड़े, अब रुको । धीरे-धीरे पुनरुक्ति से अपने हाथों को छुड़ाओ । मरने के पहले पुनरुक्ति से अपने को छुड़ा लेना, अन्यथा मरकर तुम फिर पुनरुक्त हो जाओगे । क्योंकि मरते क्षण जो आकांक्षा होगी, वही तुम्हारे नए जन्म की शुरुआत हो जाती है ।
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🌾 ओशो 🌾
एस धम्मो सनंतनो ~ भाग ५ प्रवचन ४६
जीवन-मृत्यु से पार है अमृत
प्रवचनांश से संकलन ।
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