शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

= *हैरान का अंग ६१(५/८)* =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*देख दीवाने ह्वै गये, दादू खरे सयान ।*
*वार पार को ना लहै, दादू है हैरान ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
**हैरान का अंग ६१**
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अकल न आवै अकलि१ में, सकल२ न शब्द समाय । 
त्यों रज्जब कुंभ कुम्हार के, शून्य३ जल लिया न जाय ॥५॥ 
कुम्हार के घड़े में आकाश३ का संपूर्ण जल नहीं लिया जाता है, वैसे ही वर्ण रूप कलाओं से युक्त२ शब्द में ब्रह्म नहीं समाता फिर जो ब्रह्माण्ड में और ब्रह्माण्ड के बाहर व्यापक रूप से स्थित है वह कला विभाग से रहित ब्रह्म बुद्धि१ में कैसे आ सकता है ? 
अंत न लहै अनन्त का, आतम आवैं जाँहिं । 
त्यों रज्जब मुख मुकुर१ में, प्राणी पावै नाँहि ॥६॥ 
दर्पण१ में मुख दीखता है, दृष्टि आती है फिर भी प्राणी दर्पण गत मुख को पकड़ नहीं पाता, वैसे ही आत्मा ब्रह्म में आता जाता है फिर भी उस अनन्त का अन्त नहीं जान पाता । 
पंच तत्त्व सौं पिंड कर, प्राण२ बणाया माँहि । 
रज्जब रचना अगह१ गति३, समझे समझैं नाँहिं ॥७॥ 
जिसने पंच तत्त्वों से शरीर बनाकर उसके भीतर प्राणी२ की रचना की है, उसकी वह रचना रूप लीला३ मन इन्द्रियों से अग्राह्य१ है, समझे हुये महानुभाव भी उसकों नहीं समझ पाते अन्यों की बात ही क्या ? 
पंच तत्त्व सौं पिंडकर, माँहिं समोया१ प्रान२ । 
रज्जब रचना राम की, सिध३ साधक हैरान ॥८॥ 
पंच तत्त्व से शरीर बनाकर उसमें प्राणी२ को मिला१ देता है, इस राम की रचना चातुर्य को देखकर साधक तथा सिद्ध३ सभी आश्चर्य चकित हैं ।
(क्रमशः)

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