सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

= *आसै आसण का अंग ६४(३३/३६)* =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू मन चित आतम देखिये, लागा है किस ठौर?*
*जहँ लागा तैसा जाणिये, का देखै दादू और ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*आसै आसण का अंग ६४*
मनवा निकस्या धूम ज्यों, सांई शून्य समान१ । 
अंश अंश कन जायगा, प्राणी पावक जान ॥३३॥ 
धुआँ अग्नि से निकल कर आकाश में लय१ होता है और अग्नि का अंश अग्नि अपने अंशी व्यापक अग्नि में समा१ जाता है, वैसे ही मन निकल कर ईश्वर के माया भाग में समाये१गा और चेतन में समायेगा । 
रत्न ॠद्धि निधि सिद्धि पदारथ, मुक्ति भक्ति हरि राज । 
रज्जब रुचे सु लेहु भज, जाके जासौं काज ॥३४॥ 
रत्न, ऋद्धि, निधि, सिद्धि, अन्यान्य पदार्थ, राज्य, भक्ति मुक्ति और हरि इनमें से जो प्रिय लगे और जिसका जिससे कार्य हो वह उसका चिन्तन करके ही प्राप्त करता है । 
ब्रह्म जीव काया करम, लिखे जु लच्छी१ माँहिं । 
रज्जब रुचे२ सु लेहि जिव, दात हिं दूषण नाँहिं ॥३५॥ 
ब्रह्म, जीव, शरीर, कर्म, लक्ष्मी१, इनमें जिसकी इच्छा करे, उसकी प्राप्ति का साधन करके उसे ही प्राप्त कर सकता है ऐसा प्राणी के भीतर अंकित है किन्तु प्राणी को जो प्रिय२ लगता है, उसे ही प्राप्त करता है । इसमें देने वाले ईश्वर का दोष नहीं दिया जा सकता । 
विविध भाँति की बंदगी, दीसै मांड१ मँझार । 
गाहक गौ२ की लेयगा, रज्जब रुचि व्यवहार ॥३६॥ 
ब्रह्माण्ड१ में नाना प्रकार की सेवाएँ दीखती हैं किन्तु ग्राहक तो अपने मतलब२ की सेवा ही ग्रहण करेगा, सभी का रुचि के अनुसार ही व्यवहार होता है । 
(क्रमशः)

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