शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*मति मोटी उस साधु की, द्वै पख रहित समान ।*
*दादू आपा मेट कर, सेवा करै सुजान ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com

इस क्षण में है सुख। और अगर अगले क्षण में सोचा तो धन— लोलुप हैं। इसलिए सिर्फ धनी ही पागल नहीं है; जो सोच रहा है स्वर्ग में मिलेगा, वह भी उतना ही पागल है। जो सोच रहा है परमात्मा को पा लूंगा, फिर सुख मिलेगा, वह भी पागल है। क्योंकि सबका तर्क एक ही है। तर्क यह है कि कुछ होगा, मिलेगा, फिर सुख। सुख जैसे परिणाम में आएगा। नहीं, सुख या तो अभी या कभी नहीं।
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यहां बैठे हैं। अगर सोच रहे हैं कि पढ़ कर समझ लेंगे, समझ से सारे निचोड़ लेंगे, फिर अपने जीवन का वैसा व्यवस्थापन करेंगे, तब सुख को पाएंगे—तब चूक गये। तब इसे ही धन बना लिया। फिर यह भी धन हो गया। फिर यहां भी लोभ आ गया। 
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फिर इसके अनुसार जीवन को बनाएंगे। यह टाइम—टेबिल बन जाएगा, लेकिन यात्रा कभी न होगी। कुछ लोग तो छिपाये हुए हैं टाइम—टेबिल सब जगह। टाइम—टेबिल का भी अध्ययन लोग ऐसे करते हैं जैसे धार्मिक ग्रंथ का कर रहे हों।

अपने जीवन को गौर से देखें, कहीं जीवन समय—सारिणी का अध्ययन ही तो नहीं हो गया है? धन होगा, पद होगा, प्रतिष्ठा होगी, बड़ा मकान होगा, बड़ी कार होगी, तब सुख से रहेंगे? तो कभी सुख से न रह सकेंगे। सुख से रहना हो तो अभी, अन्यथा कभी नहीं।
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*'सारे धन कमा कर मनुष्य अतिशय भोगों को पाता है, लेकिन सबके त्याग के बिना सुखी नहीं होता।'*
और ध्यान रखें, त्याग का यह अर्थ नहीं है कि सब छोड़ कर जंगल भाग जाएं। क्योंकि वह जो सब छोड़ कर जंगल भागता है, उसकी भी दृष्टि अभी भ्रांत है। वह सोच रहा है कि अब जंगल पहुंच कर सुखी होऊंगा। फिर धन की यात्रा शुरू हो गयी। 
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सूत्र है यही है, तत्‍क्षण, अभी, यहीं, जहां हैं वहीं सुखी हो जाएं !
त्याग भी धन की ही भाषा में करते हैं। एक मनुष्य त्याग करता है तो वह सोचता है, भीतर गणित बिठाता है : इतना त्याग करेंगे तो कितना मोक्ष मिलेगा? वहां भी सौदा है। इतने उपवास करेंगे तो स्वर्ग की किस सीढ़ी पर पहुंचेंगे? कितने उपवास करने से और कितना शरीर को गलाने —तपाने से सिद्धशिला पर विराजमान होंगे?
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हिसाब लगा रहा है। दूकानदार ही है यह। इसकी दूकानदारी बंद न हुई। इसने दूकानदारी नये आयाम में फैला दी। नहीं, धार्मिक व्यक्ति वही है जो कहता है. सुख पाने के लिए कोई जरूरत नहीं है। सुख हमारा स्वभाव है। उसे कल नहीं पाना है; अभी उपलब्ध है। अभी इसी क्षण उसमें डूब सकते हैं, लीन हो सकते हैं।
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'कर्तव्य से पैदा हुए दुखरूप सूर्य के ताप से जला है अंतर्मन जिसका, ऐसे पुरुष को शांतिरूपी अमृतधारा की वर्षा के बिना सुख कहां है?'
कर्तव्यदु:खमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मन:।
कुछ: प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥
'कर्तव्य से पैदा हुए दुखरूप सूर्य के ताप से जला है अंतर्मन जिसका।'

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