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*राम रटणि छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ ।*
*बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥*
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साभार ~ स्वामी सौमित्रिप्रपन्न
*“प्रपत्ति-बोधिनी”~‘नमामि भक्तमाल को’*
*- श्रीअंगद जी -*
श्रीअंगद जी रायसेनगढ़ के राजा सिलाहदीसिंह जी के चाचा थे | पहले ये भगवद्विमुख थे पर इनकी स्त्री भगवद्भक्ता थीं | एक दिन इनकी पत्नी के गुरुदेव इनके घर पर आये | इनकी पत्नी ने उनका खूब आदर-सत्कार किया फिर भगवान श्रीकृष्ण की कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं | गुरुदेव भगवान की कथा कहने लगे | तभी वहाँ श्रीअंगद जी आ गए और गुरूजी को वहाँ देखकर क्रोधित हो गए | इन्होंने गुरूजी को बहुत कुछ अनुचित कह दिया | गुरूजी तो विनम्रता एवं क्षमा की मूर्ति थे | वे चुपचाप वहाँ से चले गए | पर इनकी पत्नी को अपने गुरुदेव के अपमान से बहुत दुःख हुआ |
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इनकी पत्नी ने अन्न-जल त्याग दिया और इनसे बात करना भी बंद कर दिया | इनकी पत्नी अब अपने शरीर को त्याग देना चाहती थीं | श्री अंगद जी को अपने किए पर तो कोई पछतावा नहीं था पर ये पत्नी में बहुत ही आसक्त थे | इन्होंने पत्नी को मनाने की बहुत कोशिश करी पर वो न मानीं | तब श्री अंगद जी अपनी पत्नी के पैरों में गिर पड़े जिससे इनकी पत्नी को भारी संकोच हुआ | इन्होंने अपने किए के लिये बार-बार क्षमा माँगी | तब इनकी पत्नी ने कहा कि इन्होंने जिनका अपमान किया है उन्हीं से क्षमा माँगें |
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इनकी पत्नी ने कहा कि यदि उनके गुरुदेव श्री अंगद जी को क्षमा कर दें और वापस घर में अपने चरण डालें तभी ये अन्न-जल लेंगीं अन्यथा अपने प्राणों को त्याग देंगीं | पत्नी की बात सुनकर ये तुरंत गुरुदेव के पास पहुँचे और उन्हें मना कर घर लिवा लाये | तब इनकी पत्नी ने कहा कि ये भी गुरूजी के शिष्य बन जाएँ | इन्होंने भी गुरूजी से दीक्षा ले ली | अब इन्होंने बड़े प्रेम से गुरूजी को प्रसाद पवाया और बड़ी ही श्रद्धा के साथ गुरूजी का उच्छिष्ट प्रसाद लिया | गुरुदेव के प्रसाद से तुरंत इनके हृदय में भक्त-भगवंत और गुरुदेव के प्रति प्रीति प्रकट हो गयी |
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अब ये संत सेवा में लग गए | एक बार राजा ने इन्हें युद्ध पर भेजा | इन्होंने शत्रु सेना को हरा दिया और शत्रु राजा की टोपी ले ली | उसमें १०० बहुमूल्य हीरे जड़े थे | इन्होंने निन्यानबे हीरों को संतों की सेवा में लगा दिया और जो सबसे बहुमूल्य हीरा था उसे श्रीजगन्नाथ भगवान के लिये रख लिया |
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वो ही सम्बन्ध धन्य है जिससे कोई प्रभु भक्ति से जुड़ जाए | वो व्यक्ति धन्य है जिसका सम्बन्ध किसी भक्त से जुड़ा हो | और यदि वो व्यक्ति अपने उस सम्बन्धी से प्रेम भी करता हो तब तो कहना ही क्या | तब तो वो व्यक्ति भी भक्ति को प्राप्त ही कर लेगा और वो भी बड़ी ही सहजता से | श्री अंगद जी से अपराध बना पर एक भक्त से संबंध होने के कारण इनका तुरंत ही अतिकल्याण भी हो गया | भक्तों और संतों में प्रीति होना कोई साधारण बात नहीं होती है | अनेक जन्मों की साधना के बाद ही संतों में प्रेम उपजता है जो इन्हें तुरंत ही मिल गया | दूसरी एक बात हम उनसे कहते हैं जो यह लेख पढ़ रहे हैं | वो यह है कि हम भक्त बन जाएँ जिससे अपने से जुड़े लोगों के लिये वरदान सिद्ध हों |
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सौ हीरों से जड़ी हुई टोपी की बात राजा सिलाहदीसिंह तक पहुँच गयी | उसने श्री अंगद जी को कहलवा दिया कि यदि ये बचा हुआ एक हीरा राजा को दे दें तो वह निन्यानबे हीरों को भूल जायेगा | पर बचा हुआ हीरा तो इन्होंने जगन्नाथ जी के लिये रखा था इसलिए इन्होंने किसी की बात नहीं मानी | श्रीअंगद जी की बहन थी जो इनके यहाँ ही रहती थी | रसोई का काम वही देखती थी | राजा ने एक षड्यंत्र रचा | उसने इनकी बहन जो राजा की बुआ थी, के पैर छूकर एवं लोभ-लालच देकर अपनी योजना में शामिल कर लिया |
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राजा ने बुआ से कहा कि वो श्रीअंगद जी को खाने में जहर मिला कर दे दे तो अंगद जी के मरने पर राजा बहुत सारा धन एवं जमीन उसको दे देगा | उसने राजा की बात मान ली | उसने भोजन में विष मिला दिया और भगवान का भोग भी लगा दिया | फिर श्रीअंगद जी को प्रसाद पाने के लिये बुलाया | बहन की एक लड़की थी जिसे अंगद जी बहुत प्रेम करते थे | श्रीअंगद जी उसे श्रीराधा जी की सखी मानकर अपने साथ बैठकर ही भोजन कराते थे | इसलिए अपनी लड़की को बचाने के लिये इनकी बहन ने लड़की को बाहर भेज दिया था |
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श्रीअंगद जी ने उसके बिना भोजन करने से मना कर दिया | जब इनकी बहन ने देखा कि ये उसकी लड़की से इतना स्नेह करते हैं तब उसे अपने किए पर बहुत पछतावा होने लगा | वो इनके गले लगकर रोने लगी और सारी बात बता दी | वह थाली लेकर जाने लगी तो इन्होंने उसे रोक दिया | इन्होंने कहा कि विष देना ही था तो इन्हें देती, भगवान को भोग क्यों लगाया | इन्हें इस बात का बहुत कष्ट था कि भगवान को विष का भोग लगा दिया गया है | इन्होंने कहा कि ये प्रसाद ज़रूर लेंगे | बहन ने बहुत रोका तो इन्होंने उसे कमरे से बाहर करके दरवाजा बंद कर लिया और सारा प्रसाद खा गए | पर इनके ऊपर विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि इनके मुख पर एक नई कान्ति प्रकट हो गयी | पर इन्हें अभी भी बहुत कष्ट था कि भगवान को विष का भाग ग्रहण करना पड़ा है |
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जैसा कि हमने पहले भी कई बार देखा है, यहाँ भी वही हुआ – भक्ति से परिणाम बदल गया | भक्ति ने शत्रुता को मित्रता में बदल दिया(बहन का वैर मिट गया) और गरल सुधा बन गया | कुछ भी होता रहे पर भक्ति को पकड़े रहो | भक्ति साथ है तो उसके स्पर्श से सब शुभ एवं मंगल ही होगा | साथ ही देखिये कि श्री अंगद जी में अपने ठाकुर के प्रति कितना प्रेम है | इन्हें इस बात का कष्ट है कि इनके कारण प्रभु को विष लेना पड़ा | जो भक्त अपने भगवान के बारे में सोचा करता है, भगवान उससे ज्यादा उसके बारे में सोचा करते हैं | वास्तव में केवल भगवान ही ऐसे हैं जिनसे प्रेम करने पर अपार प्रेम मिलेगा | संसारिकता से प्रेम करने पर तो प्रेम का ही अपमान होगा | संसार सेवा करने के लिये है और भगवान प्रेम करने के लिये |
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श्रीअंगदसिंह जी ने सोचा कि अब अधिक विलम्ब किए बिना हीरा श्रीजगन्नाथ भगवान को समर्पित कर देना चाहिए | वह विचार कर ये श्रीजगन्नाथपुरी की ओर चल पड़े | समाचार पाते ही राजा बहुत क्रोधित हुआ और सिपाहियों को आज्ञा दी कि वो इनसे हीरा छीनकर ले आयें | सिपाहियों ने रास्ते में इन्हें घेर लिया और कहा कि ये हीरा दे दें अन्यथा सिपाहियों को बल प्रयोग करना पड़ेगा |
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इन्होंने कहा कि ठीक है, ये पहले कुण्ड में स्नान कर लें फिर हीरा दे देंगे | ये कुण्ड में गए और प्रभु से प्रार्थना करी कि वो हीरे को यहीं से स्वीकार कर लें | इनकी पुकार में इतना प्रेम था कि श्रीजगन्नाथ भगवान ने सात सौ कोस लम्बा हाथ बढ़ाकर हीरा स्वीकार कर लिया और उसे अपने वक्षःस्थल पर धारण कर लिया |
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श्रीभगवान प्रेम के साथ सब स्वीकार कर लेते हैं और प्रेम के बिना कुछ स्वीकार नहीं करते हैं | भक्त का प्रेम हो तो बिना हाथ के भी प्रभु हाथ बढ़ा देते हैं | प्रेम हो तो भक्त को कहीं जाना नहीं पड़ता है स्वयं भगवान चले आते हैं | सबसे बड़ी चीज़ है प्रेम | प्रभु को और उनकी कृपा को पाना हो तो प्रेम को ले आओ और प्रेम संतों की कृपा से मिलता है जैसे श्रीअंगद जी को उनके गुरु महाराज के सीथ प्रसाद से मिल गया था |
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स्वामी सौमित्रिप्रपन्नाचार्य
श्रीराम प्रपत्ति पीठ
देवराहा बाबा आश्रम, आस्तीक ऋषि तपस्थली

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