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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १५.राग सिंधूड़ो =*
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(३/२)
*षिमा आइकै हंसने लागी सीस चरन कौं नायौ रे ।*
*चूक हमारी बकसहु स्वामी इतनैं क्रोध नसायौ रे ॥४॥*
*तबहिं लोभ रन आइ पचार्यौ मैं तौ सब ही जीते रे ।*
*जौ सुमेर घर भीतरि आवै पौ पट सबन के रीते रे ॥५॥*
*इत संतोष आइ भयौ ठाढौ बोलै बचन उदासा रे ।*
*हौनहार सो ह्वै है भाई कीयौ लोभ कौ नासा रे ॥६॥*
*महा लोभ कौं लागी चटपटी अति आतुर सौं आयौ रे ।*
*मेरे जोधा सब ही मारे ऐसौ कौंन कहायौ रे ॥७॥*
इसी समय क्षमा ने वहाँ आकर हँसते हुए अपना सिर झुकाया तथा यह कहा - “हे स्वामिन ! हमारा अपराध(प्रसाद) क्षमा करें ।” इसी समय क्रोध भी नष्ट हो गया ॥४॥(ख)
इस घटना के तत्काल बाद, *लोभ* ने आकर मदभरे स्वर में कहना आरम्भ किया – “मैंने तो संसार में सभी को जीत लिया है । मेरे रहते हुए किसी के घर में सुमेरु पर्वत जितना धन भी पड़ा हुआ हो तो भी वह मन से धन का भूखा ही है ॥५॥”
इतने में ही *संतोष* भी उस सभा में पहुँच गए और उदास स्वर से यह बोले - “इस व्यवहार जगत् में भाग्यवश जो होना है वही होगा, अन्य कुछ नहीं ।” यह सुनकर लोभ भी वहाँ से चला गया ॥६॥
तब *महालोभ* को उत्सुकता हुई, अत: वह वहाँ आया, और बोला - “मेरे सभी योद्धाओं को मार दे, ऐसा कौन वीर इस जगत में उत्पन्न हुआ है ! ॥७॥”
(क्रमशः)

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