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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १६. राग सोरठ =*
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(५/१)
*मेरा मन राम नाम सौं लागा ।*
*तातें भरम गया भै भागा ॥(टेक)*
*आसा मनसा सब थिर कींनी, सत रज तम त्यागै तींनी ।*
*पुनि हरष सोक गये दोऊ, मद मच्छर रहे न कोऊ ॥१॥*
*नष शिष लैं देह पषारी, तब सुद्ध भई सब नारी ।*
*भया ब्रह्म अग्नि सुप्रकासा, किया सकल कर्म का नासा ॥२॥*
अब मेरा यह शुद्ध निर्मल चित्त राम नाम में मत्त हो गया है । इसके आश्रय से इस का समस्त सांसारिक भ्रम पूर्णतः विगलित हो गया है ॥टेक॥
अब इस चित्त की सभी आशा एवं तृष्णा स्थिर या निवृत्त हो चुकी है । इसके सत्त्व रज एवं तम – तीनों गुण दूर हो गये हैं । सर्वविध हर्ष एवं शोक भी निवृत्त हो गये हैं । अब इसमें किसी प्रकार का मद या अहंकार भी नहीं रह गया है ॥१॥
नख से शिखा तक यह समस्त शरीर भी धुल कर स्वच्छ हो गया है, अतः सभी इन्द्रियां भी अब स्वच्छ हैं । इसमें सब ओर ब्रह्मप्रकाश फैल गया है । तथा सभी कर्मों का भी क्षय हो गया है ॥२॥
(क्रमशः)

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