गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग २१२/२१५

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
परिचय जिज्ञासु उपदेश
दादू - सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन ।
सबै दिशा श्रवण हु सुणैं, सबै दिशा कर नैन ॥२१२॥
सबै दिशा पग शीश हैं, सबै दिशा मन चैन ।
सबै दिशा सन्मुख रहै, सबै दिशा अँग ऐन ॥२१३॥
ब्रह्म के सर्वव्यापक,सर्वेस्वरूप एवं सर्वत्र समान होने से सभी दिशाओं में उसके मुख, नेत्र, हाथ, वचन एवं श्रवण हैं । अतएव सभी दिशाओं में खाता है, देखता है, सुनता है, बोलता है, चलता है, इच्छा करता है और सबके सम्मुख रहता है । उसके दर्शनों का आनंद भी सभी जगह पाया जा सकता है, क्योंकि वह सर्वत्र विराजमान है ।
श्रुति में लिखा है; उसके हाथ-पैर, आंख, शीश, मुख और चारों तरफ है । और वह सब को व्याप्त करके रहता है ।
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बिन श्रवण हुँ सब कुछ सुणे, बिन नैनहु सब देखै ।
बिन रसना मुख सब कुछ बोलै, यह दाजू अचरज पेखै ॥२१४॥
ब्रह्म निरवयव होने से नेत्र, श्रवण, नासिका आदि इन्द्रियों से रहित है । फिर भी वह देखता है, सुनता है, सुंघता है, बोलता है - यह महान् आश्चर्य है ।
श्रुति में लिखा है :: “वह हाथ-पैर रहित है तो भी पकड़ता है, नेत्र नहीं हैं तो भी देखता है, कान नहीं हैं, तो भी सुनता है । वह जानने योग्य पदार्थों को जानता है, फिर भी उसे जानने वाला कोई नहीं । उसी को आदि पुरुष कहते हैं ।”
“सबका साक्षी, सबकी आत्मा, सबके अन्तकरण रूपी गुहा में स्थित है । सब इन्द्रियों के आभासवाला तथा सब इन्द्रियों से रहित है ।”
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परिचय जिज्ञासु उपदेश
सब अंग सब ही ठौर सब, सर्बंगी सब सार ।
कहै गहै देखै सुने, दादू सब दीदार ॥२१५॥
ब्रह्म के सब का कारण तथा सर्वमय होने से उसी से सब की उत्पत्ति होती है । जैसे मिट्टी से बना घट मृन्मय है, वैसे ही जगत् भी ब्रह्म से पैदा होने के कारण ब्रह्ममय है । अत: सर्वत्र उसके अंग हैं । वही सबका सारभूत है । वह सर्वत्र सुनता है, बोलता है, देखता है, पकड़ता है और सभी जगह उसका दर्शन किया जा सकता है । यही ब्रह्मज्ञान का स्वरूप है ।
मुण्डकोपनिषद में लिखा है :: “हे प्रिय शौनक ! पहले खण्ड में जो ब्रह्म का स्वरूप बताया है, वह सत्य है । जैसे प्रज्वलित अग्नि से तत्सम नानाविध हजारों चिन्गारियाँ प्रकट होती हैं, उसी तरह अविनाशी ब्रह्म से नानाविध भाव उत्पन्न होते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं ।
निश्चय ही वह दिव्यपूर्ण पुरुष निराकार तथा सर्वत्र(बाहर-भीतर) व्याप्त है । जन्मादि छ: भाव विकारों तथा प्राण मन से रहित होने के कारण वह सर्वथा विशुद्ध है । अतएव अविनाशी आत्मा से वह श्रेष्ठ है ।
इसी परब्रह्म से प्राण, मन(अन्त:करण) सभी इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, जल, तेज और समग्र विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी - ये सब उत्पन्न होते हैं ।
परब्रह्म का अग्नि मस्तक है, सूर्य-चन्द्रमा नेत्र हैं, सभी दिशाएँ कान हैं और वेद उसकी प्रकट वाणी है । वायु, प्राण और जगत, हृदय तथा पृथ्वी उसके पैरों से पैदा होती है, अत: वह पैर है । वह ब्रह्म समस्त भूतों का अन्तरात्मा है ।”
(क्रमशः)

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