शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग २१८/२२०

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
नूर हि का धर, नूर हि का घर, नूर हि का वर मेरा ।
नूर हि मेला, नूर हि खेला, नूर अकेला, नूर हि मंझ बसेरा ।
नूर हि का अंग, नूर हि का संग, नूर हि का रंग मेरा ।
नूर हि राता, नूर हि माता, नूर हि खाता दादू तेरा ॥२१८॥
इस साखी के वचन में ‘धर’ का अर्थ है पृथ्वी । यह पृथ्वी शब्द यहाँ प्रपञ्च का उपलक्षण है । अतः ज्ञानियों को समस्त प्रपञ्च ब्रह्मरूप ही भासित होता है, क्योंकि श्रुति में “यह सब कुछ ब्रह्म ही है” - ऐसा लिखा है । घर = गृह, निवास । मेरा घर भी तेजोमय ब्रह्म है अर्थात ब्रह्म में ही मेरे मन निवास करता है । ‘वर’ पति को कहते हैं । मेरा स्वामी ब्रह्म ही है ।
क्योंकि श्रुति में लिखा है - “ब्रह्म एक अद्वितीय है” । उसी में मैं निवास करता हूँ । जीव उसी का अंग है अर्थात उसे का स्वरुप है । उसी भाव के साथ मेरा सम्बन्ध है । रंग = प्रेम अर्थात मेरे मन में उसी का प्रेम है । उसी के साथ खेलता हूँ । उसी ब्रह्म में निमग्न रहता हूँ । अधिक क्या कहूं ? मेरा तो भोजन भी ब्रह्म ही है, जिससे मेरे शरीर का पोषण तथा मन तृप्त होता रहता है ॥२१८॥
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*सूक्ष्म सौंज अर्चा बन्दगी*
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ बसै माबूदं ।
तहँ बंदे की बंदगी, जहाँ रहै मौजूदं ॥२१९॥
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहँ खालिक भरपूरं ।
आली नूर अल्लाह का, खिदमतगार हजूरं ॥२२०॥
साधक के शुद्ध अंतःकरण में ज्योतिर्मय ब्रह्म सदा सुशोभित होता है । वहीं उसकी उपासना करनी चाहिये । वह वहां स्थित रहता हुआ भी सर्वव्यापक है । वहां मैं उस सृष्टिकर्ता के दर्शन करता हूँ ।
(क्रमशः)

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