मंगलवार, 28 मई 2019

= *अज्ञान कसौटी का अंग ७९(२१/२४)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार ।*
*पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥* 
*नखसिख सब सुमिरण करैं, ऐसा कहिये जाप ।*
अन्तर बिगसै आत्मा, तब दादू प्रगटै आप ॥* 
*अंतरगत हरि हरि करे, तब मुख की हाजत नांहि ।*
*सहजैं धुनि लागी रहै, दादू मन ही मांहि ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*अज्ञान कसौटी का अंग ७९*
अरिल - 
अज्ञानी कसि१ देह न मन को मार है । 
ज्यों संकट मधि सर्प विष हि अधिकार२ है । 
तैसे शठ हठ देखि न कबहूं कीजिये । 
परिहां रज्जब परखो प्राण प्रपंच न धीजिये३ ॥२१॥ 
अज्ञानी शरीर को कष्ट१ देता है, मन को नहीं मारता, जैसे संकट में सर्प का विष अधिक२ हो जाता है, वैसे ही शरीर को कष्ट देने से मन अधिक विक्षिप्त हो जाता है, इस प्रकार का मूर्खों का हठ देखकर उनके समान कभी नहीं करना चाहिये, प्राणी के हृदय की परीक्षा करो वह कैसा है, केवल ढोंग पर विश्वास३ मत करो । 
ग्यारस रोजे जैन व्रत, कण कण तिन को काल । 
सो रज्जब क्यों करहिगे, प्राणहुं की प्रति पाल ॥२२॥ 
एकादशी व्रत तथा रोजा और जैन व्रत करने वालों को व्रत के दिनों में अन्न के कण कण में काल प्रतीत होता है, यदि यह बात सत्य है तो उन दिनों में वे अन्न कण अन्य प्राणियों की रक्षा कैसे करेंगे ? और करते हैं, अत: उक्त बात कल्पना मात्र है । 
जंत्र१ तार तत्त्व पंच तन, रचि२ जंत्रक३ स्वर भौन । 
रज्जब तंति४ उतार कर, राग बजावे कौन ॥२३॥ 
बाजे बनाने वाला३ तंदूरा१ बना कर उस पर २ षडज के, २ पंचम के, और १ मध्यम का ये पांच तार चढाता है । स्वर भौन(स्वर मंडल तार-वाद्य) बनाता२ है । बकरे की तांतें४ लगाकर रबाब बनाता है, किन्तु तंदूरे और स्वर मंडल के तार तथा रबाब की तांतें उतार कर उनमें राग कौन बजा सकता है ? अर्थात उक्त तार और तांतों को उतारना अज्ञान पूर्वक कष्ट ही उठाना है, वैसे ही पंच तत्त्व से रचित शरीर से प्राण को निकालकर उसे कौन बुला सकता है ? प्राण निकालना अज्ञानपूर्वक कष्ट ही देना है । रबाब का प्राचीन नाम "रुद्वीणा" था मुसलमानों ने रबाब नाम रखा है । फारस, अफगानिस्तान और काश्मीर में यह अधिक प्रचलित है । 
वायु बिना बोहित१ थकित२, त्यों सुमिरण बिन श्वास । 
रज्जब रचना राम की, समझ विवेकी दास ॥२४॥ 
जैसे वायु के बिना बड़ी नाव१ थक२ जाती है, अधिक नहीं चल सकती, वैसे ही नाम-स्मरण बिना श्वास समाधि की और जाने से थक जाती है अर्थात नाम-स्मरण बिना अंतर्मुखता नहीं बढती और अंतर्मुखता बिना बहिमुर्ख की समाधि नहीं लगती राम की रचना ऐसी ही है, हे विवेकी भक्त ! इसको समझने का प्रयत्न करके गुरु द्वारा समझ । 
(क्रमशः)

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