बुधवार, 29 मई 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*इन्द्री के आधीन मन, जीव जंत सब जाचै ।*
*तिणे तिणे के आगे दादू, तिहुं लोक फिर नाचै ॥*
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साभार ~ Atul Verma 


अभी रूस में एक मनोवैज्ञानिक कुछ समय पहले चल बसा, पावलव। उसने मनुष्य की ग्रंथियों पर बहुत से काम किए हैं। उसमें एक काम आपको खयाल में ले लेने जैसा है। उसका यह कहना है कि अगर आदमी की कोई ग्रंथि, विशेष ग्रंथि काट दी जाए, कोई ग्लैंड अलग कर दी जाए, तो उसमें से कुछ चीजें तत्काल नदारद हो जाती हैं।
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जैसे आप में क्रोध है। आप सोचते हैं, मैं क्रोध करता हूं, तो आप गलती में हैं। आपकी इंद्रियों में क्रोध की ग्रंथियां हैं और जहर इकट्ठा है। वह आपने जन्मों-जन्मों के संस्कारों से इकट्ठा किया है। वही आपसे क्रोध करवा लेता है–वह जहर।
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पावलव ने सैकड़ों प्रयोग किए कि वह जहर की गांठ काटकर फेंक दी, अलग कर दी। फिर उस आदमी को आप कितनी ही गालियां दें, वह क्रोध नहीं कर सकता; क्योंकि क्रोध करने वाला उपकरण न रहा। ऐसे ही, जैसे मेरा हाथ आप काट दें। और फिर मुझसे कोई कितना ही कहे कि हाथ बढ़ाओ और मुझसे हाथ मिलाओ, मैं हाथ न मिला सकूं। कितना ही चाहूं, तो भी न मिला सकूं। क्योंकि हाथ तो नहीं है, चाह रह जाएगी नपुंसक पीछे। हाथ तो मिलेगा नहीं, उपकरण नहीं मिलेगा।
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अगर इतना होश पैदा कर सकें कि यह इंद्रिय मुझसे करा रही है; और मैं पृथक हूं; जिस दिन आपको पृथकता का अनुभव हो जाए, उसी दिन आप अपनी मालकियत की घोषणा कर सकते हैं। और मजा ऐसा है कि आपने घोषणा की कि मैं मालिक हूं, कि सारी इंद्रियां सिर झुकाकर पैर पर पड़ जाती हैं। आपकी घोषणा की सामर्थ्य चाहिए बस।
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मैंने आपसे कहानी कही है कि उस महल का मालिक घर के बाहर है, या सोया है, या बेहोश है, या मौजूद नहीं है। नौकर सब मालिक हो गए हैं। उस कहानी को हम थोड़ा और आगे बढ़ा ले सकते हैं कि मालिक वापस लौट आया। उसका रथ द्वार पर आकर रुका। 
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जो नौकर दरवाजे पर था, उसने चिल्लाकर यह नहीं कहा कि मैं मालिक हूं। कैसे कहता ! वह जल्दी से उठा और उसके पैर छुए। उसने कहा कि बहुत देर लगाई। हम बड़ी प्रतीक्षा कर रहे थे ! वह मालिक घर के भीतर आया। सारे नौकरों में खबर पहुंच गई। वे सब प्रसन्न हैं; नाराज भी नहीं हैं; मालिक वापस लौट आया। अब घर में कोई घोषणा नहीं करता कि मैं मालिक हूं। मालिक की मौजूदगी ही घोषणा बन गई।
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ठीक ऐसी ही घटना इंद्रियों के जगत में घटती है। एक दफे आप जान लें कि मैं पृथक हूं, और एक बार खड़े होकर कह दें कि मैं पृथक हूं, आप अचानक पाएंगे कि जो इंद्रियां कल तक आपको खींचती थीं, वे आपके पीछे छाया की तरह खड़ी हो गई हैं। वह आपकी आज्ञा मानना उन्होंने शुरू कर दिया है।
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आप आज्ञा ही न दें, तो इंद्रियों का कसूर क्या है? आप मौजूद ही न हों, तो आज्ञा कौन दे? और इंद्रियों को गाली मत देना, जैसा कि अधिक लोग देते रहते हैं। कई लोग यही गालियां देते रहते हैं कि इंद्रियां बड़ी दुश्मन हैं।
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इंद्रियां दुश्मन नहीं हैं। इंद्रियां दुश्मन हैं, अगर आप मालिक नहीं हैं। ध्यान रखना, यह फर्क है। इंद्रियां मित्र हो जाती हैं, अगर आप मालिक हैं। इसलिए भूलकर इंद्रियों को गाली मत देना। कई बैठे-बैठे यही गालियां देते रहते हैं कि इंद्रियां बड़ी शत्रु हैं, बड़े गड्ढों में गिरा देती हैं ! कोई इंद्रिय गड्ढे में नहीं गिराती। आप गड्ढे में गिरते हैं, तो इंद्रियां बेचारी साथ देती हैं। 
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आप स्वर्ग की तरफ जाने लगें, इंद्रियां वहां भी साथ देती हैं; वे उपकरण हैं।
मगर आपने कभी मालकियत की घोषणा न की। आप अपने नौकरों के पीछे चल रहे हैं। कसूर किसका है? और नौकरों के पीछे चलकर फिर गालियां दे रहे हैं कि नौकर हमको भटका रहे हैं, वे हमको गलत जगह ले जा रहे हैं !
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कम से कम कहीं तो ले जा रहे हैं ! चला तो रहे हैं किसी तरह। आप तो मौजूद ही नहीं हैं। आप तो मरे की भांति हैं; जिंदा ही नहीं हैं। आप हैं या नहीं, इसका भी पता नहीं चलता।
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कृष्ण इसलिए बहुत ठीक डिस्टिंक्शन करते हैं। वे इंद्रियों को नहीं कहते कि इंद्रियां शत्रु हैं। और जो आदमी आपसे कहे, इंद्रियां शत्रु हैं, समझना कि उसे कुछ भी पता नहीं है। कृष्ण कहते हैं, मालिक न होना शत्रुता बन जाती है अपनी। मालिक हो गए कि मित्र हो गए।
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आज के लिए इतना ही। लेकिन उठेंगे नहीं। पांच मिनट कीर्तन के लिए रुकेंगे। शरीर तो कहेगा कि उठो। जरा काबू रखना। इंद्रियां तो कहेंगी कि भागो। मगर जरा काबू रखना। एक पांच मिनट जरा मालिक होने की कोशिश करना। जो भागा, हम समझेंगे, गुलाम है।
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तो हम पांच मिनट थोड़ा कीर्तन में डूबेंगे, उसमें जरा डूबें। कम से कम बैठकर वहीं से कीर्तन में साथ दें, आवाज दें, ताली बजाएं, आनंदित हों।
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गीता-दर्शन, भाग 3, 
अध्याय-6, प्रवचन3

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