बुधवार, 29 मई 2019

= *अज्ञान कसौटी का अंग ७९(२५/२८)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू यहु मन मींडका, जल सौं जीवै सोइ ।*
*दादू यहु मन रिंद है, जनि रु पतीजै कोइ ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*अज्ञान कसौटी का अंग ७९*
पवन१ पिंड पौरुष गया, गिरड़ी२ चाटे वीर३ । 
चाकी चून न पीसिये, रज्जब रोकें नीर ॥२५॥ 
चक्की की मानी२ ढीली हो जाती है तब आटा नहीं पिसता, इसे ही गिरडी चाटना कहते हैं फिर उस पर जल से भिगों कर कपड़ा रखते हैं तब वह फूलकर संकुचित हो जाती है और आटा पिसने लगता है, जैसे गिरडी ढीली होने से चक्की की शक्ति क्षीण हो जाती है आटा नहीं पिसता, वैसे ही ब्रह्मचर्य नहीं रखने से शरीर तथा प्राणों१ की शक्ति क्षीण हो जाती है, अत: हे भाई३ ! वीर्य रूप जल को रोको जिससे ज्ञान शक्ति बढकर अज्ञानजन्य कष्ट दूर हो । 
जल दल१ निगले पौन२ सौं, बाहर काढै पौन । 
रज्जब पैंडा३ पौन का, प्राणी बंधे४ कौन ॥२६॥ 
प्राण वायु२ से ही अन्न१-जल निगले जाते हैं और मल को बाहर भी वायु ही निकालता है, तब कौन विचारशील प्राणी वायु के मार्ग३ को रोकेगा४ ? अर्थात आत्म-ज्ञान से शून्य प्राणी ही रोकेगा । 
गोरख ज्ञान अनन्त अपार, 
मारुत१ बिना क्यों करे विचार । 
प्राण२ प्रमोधे३ वायु४ तोड़ी, 
निरख नरेश निनाणवे कोड़ी५ ॥२७॥ 
यदि कहो गोरक्ष नाथ ने वायु का मार्ग रोका था, तो उसका ज्ञान तो अनन्त आपार था वे श्वासों१ के चले बिना विचार कैसे करते, देख उन्होंने तो प्राणायाम४ को भंग करके निनानवे प्रकार५ के नरेशों को तथा अनेक प्रणियों२ को उपदेश३ दिया था, इससे ज्ञात होता है वे तो ज्ञानी थे, उनका साधन अज्ञान-पूर्ण न था । 
मोटी१ वायु सु बंधिये, यथा मसक में पौन२ । 
गुनाहगार छूटे फिरै, कारज सरै सो कौन ॥२८॥ 
जैसे लुहार की मसक में वायु२ बंध जाती है, वैसे ही महान्१ वायु को तो बाँध लेते हैं किन्तु जो दोषी हैं वे मन इन्द्रिय तो खुले विषयों में भ्रमण करते हैं, वह कार्य कौन सा है जो ऐसा करने से सिद्ध होगा ? अर्थात मुक्ति रूप कार्य ऐसे नहीं होता । 
(क्रमशः)

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