गुरुवार, 13 जून 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*केते पारिख पच मुये, कीमत कही न जाइ ।*
*दादू सब हैरान हैं, गूँगे का गुड़ खाइ ॥*
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साभार ~ Soni Manoj
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विद्यार्थी : आपने कहा कि परमात्मा एक सृजन की प्रक्रिया है तो फिर चीजें क्यों पैदा होती हैं ? उस सृजन का उद्देश्य क्या है ? या फिर वह कुछ ऐसा है *जो है* और हमें उसे बिना किसी कारण या उद्देश्य के ही अनुभव करना चाहिए ?
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ओशो : यदि परमात्मा एक व्यक्ति की तरह हो तो यह प्रश्न संगतिपूर्ण है । यदि परमात्मा कोई व्यक्ति हो तो उससे हम पूछ सकते हैं कि तुमने यह संसार *क्यों* बनाया ? परंतु परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं । परमात्मा तो एक प्रक्रिया है और आप प्रक्रिया से नहीं पूछ सकते कि तुम *क्यों* हो ? अस्तित्व है बिना कारण के, क्योंकि कारण की तरह सोचने से हम कहीं नहीं पहुंचते । 
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यदि आप एक कारण के पार जाते हैं तो दूसरा कारण उपस्थित हो जाता है और यदि आप उसके भी पार जाएं तो फिर नया कारण खड़ा हो जाता है और *क्यों* वैसा का वैसा अनंत तक बना रहता है । आप एक *क्यों* पूछें और आपको फिर दूसरे *क्यों* से सामना करना पड़ेगा । परंतु यदि परमात्मा कोई व्यक्ति होता तो वो *व्हाई* - *क्यों* संगत हो जाता ।
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परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं । आप उससे नहीं पूछ सकते । आप ही *वह* हैं । आप स्वयं ही कारण हैं । अस्तित्व अकारण है, अन्यथा आपको अंत तक कारण खोजने होंगे । पर ये बातें अर्थहीन हैं । यदि आप उसे अंतिम कारण बतलाते हैं तो इसका अर्थ होता है कि आप अब नहीं पूछेंगे कि इसका क्या कारण है । यहां तक कि जो व्यक्ति परमात्मा को स्रष्टा की तरह, क्रियेटर की तरह मानता है वह कहता है कि परमात्मा ने ही सृष्टि की रचना की है । वह भी *क्यों* खोज सकता है और उत्तर पा सकता है परंतु यदि आप उससे पूछें कि परमात्मा *क्यों* है ? वह *क्यों* है ? तब धार्मिक व्यक्ति कहेगा - परमात्मा के होने का कोई कारण नहीं है । वह स्वयं कारण है, इसलिए उसका कोई कारण नहीं ।
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अस्तित्व अकारण है । आरंभ में कोई कारण नहीं है, इसलिए अंत में कोई उद्देश्य नहीं है । जब कोई कारण होता है तभी कुछ उद्देश्य हो सकता है वस्तुत : कोई आरंभ ही नहीं है । क्योंकि यदि कोई आरंभ हो तो कारण भी होना चाहिए अस्तित्व आरंभ-रहित है । उसका कोई अंत भी नहीं; क्योंकि आरंभ-रहित अंत को भी नहीं पहुंच सकता । इसलिए कोई आरंभ नहीं है, कोई अंत नहीं है । वह शाश्वत है, अकारण है, उद्देश्य-रहित है । 
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लेकिन हमारे मानव-चित्त के लिए यह बात अर्थहीन है क्योंकि हम कारण की भाषा में सोचते हैं, *कहां से* और *कहां को* उद्देश्य की भाषा में सोचते हैं । अपनी इन मानवीय सीमाओं के कारण हम सोच ही नहीं सकते कि ऐसा कुछ हो सकता है जो अनादि, अनंत, अकारण और उद्देश्य-रहित है । उसका कोई उद्देश्य नहीं या *होना* ही मात्र उद्देश्य है । *होना* - *टु बी* अस्तित्व का होना ही मात्र उद्देश्य है । तब फिर कैसे कुछ कारण हो सकता है और कैसे कोई उद्देश्य हो सकता है ? *होना* ही बहुत है ।
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आप इसे दूसरी तरह भी सोच सकते हैं, दूसरे दृष्टिकोण से भी देख सकते हैं । जब आप किसी से प्रेम करते हैं तब आप नहीं पूछते कि इसका क्या कारण है । और यदि प्रेम है जो किसी कारण से आया है तो वह खो जाता है, वह प्रेम नहीं रह पाता । प्रेम अकारण ही खिलता है । यदि आप कोई कारण बतला सकें तो उसका सौंदर्य खो जाएगा । तब फिर वह वैज्ञानिक स्पष्टीकरण होगा । आप नहीं कह सकते किसलिए ? प्रेम का कोई उद्देश्य नहीं होता । यदि मैं आपसे प्रेम करता हूँ तो मैं नहीं कह सकता कि क्यों और किसलिए ? यदि मैं आपसे किसी कारणवश प्रेम करूं तो फिर वह प्रेम नहीं है । वह तो उद्देश्य-रहित है ।
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प्रेम में हम परमात्मा के पास होते हैं । इसलिए जीसस ने कहा कि *प्रेम ही परमात्मा है ।* यह नहीं कहा कि परमात्मा *प्रेम* करना है । नहीं, वह अर्थ नहीं है । परमात्मा प्रेम है या प्रेम में हम सृजन की प्रक्रिया के बिल्कुल पास होते हैं । प्रेम शिखर है जहां पहुंचकर हमें पता चलता है कि धर्म क्या है । प्रेम ही धर्म है, इसलिए जो व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता, प्रार्थना नहीं कर सकता । वह व्यक्ति जो प्रेम नहीं कर सकता, धार्मिक नहीं हो सकता है, क्योंकि केवल प्रेमपूर्ण हृदय ही निरुद्देश्यता की, अकारण की भाषा में सोच सकता है । प्रेम पर्याप्त है, वह उसके आगे कुछ नहीं मांगता । वह स्वयं अपने में परिपूर्ण है । वह अपने में पूरा है । प्रेम का एक क्षण भी शाश्वतता है अपने में ।
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इसलिए जब हम पूछते हैं क्यों ? कहां ? कैसे ? तो हम धार्मिक प्रश्न नहीं पूछ रहे हैं । अगर आप पूछते हैं कैसे ? तो प्रश्न विज्ञान-संबंधी बन जाता है । *कैसे* यह प्रश्न विज्ञान का आधार है । कैसे संघटित हो रहा है ? अगर आप पूछते हैं क्यों ? तो प्रश्न फिलासफी से संबंधित हो जाता है । पर धर्म में कोई प्रश्न नहीं होता । 
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धर्म के लिए कोई प्रश्न नहीं करता । खोज तो होती है पर कोई प्रश्न नहीं होता । खोज तो होती है कि क्या है ? न तो कैसे न क्यों, पर क्या है ? सच ही, कैसे का हल आसान है और हम हल करने चले जा सकते हैं और उसका कोई अंत नहीं आता । प्रत्येक समाधान नयी समस्या पैदा कर देता है । *कैसे* ? फिर सामने खड़ा मिलता है ।
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इसलिए विज्ञान प्रगति करता चला जाएगा । हम ऐसे दिन के लिए सोच ही नहीं सकते जब वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं से निकलेंगे और कहेंगे कि अब हमने प्राप्त कर लिया है ।
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विचारक भी विचार करते चले जाएंगे - *क्यों* और *क्यों* ? और उतने ही उत्तर होते चले जाएंगे जितने विचारक होंगे । अगर इस पृथ्वी पर प्रत्येक आदमी विचार करना शुरू कर दे तो लाखों-करोड़ों उत्तर हो जाएंगे । हर एक कह सकता है - इसलिए । परंतु धर्म पूछता ही नहीं । धर्म तो एक खोज है, न कि प्रश्न करना । यह तो *जो* है उसकी खोज है । न आरंभ की, न अंत की, न कारण की, न उद्देश्य की, बल्कि *क्या है जो है,* उसकी । इस क्षण भी यहां, अभी *जो है, क्या है* की खोज है ।
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वैज्ञानिक चित्त खोज करता जा सकता है बिना स्वयं को जरा भी बदले हुए । एक विचारक उत्तरों की इजाद करता चला जा सकता है बिना एक इंच हिले-डुले । परंतु धार्मिक चित्त बिना बदले प्रारंभ भी नहीं कर सकता । जिस क्षण यह पूछना आरंभ करता है कि क्या है, परिवर्तन होता है, रूपांतरण होता है, क्योंकि वह स्वयं उस *क्या* का अंतरंग हिस्सा है । 
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न तो आप *कैसे* के अंतरंग हिस्से हैं और न आप *क्यों* के अभिन्न अंग हैं । न तो आरंभ में आपसे पूछा गया था और न अंत के नियोजन के लिए आपसे कहा गया है । हम तो मध्य में हैं, *है* के बीच में । हम केवल *जो है* यहां, अभी, इस क्षण, उससे संबंधित हैं ।
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इसलिए, धर्म वर्तमान से संबंधित है, न भूत से, न भविष्य से । और वर्तमान ही अस्तित्व है । वर्तमान ही केवल समय है । अतीत स्मृति है । भविष्य कल्पना है । वर्तमान ही केवल अस्तित्व है । धर्म अस्तित्व है, निरुद्देश्य, अर्थहीन, अकारण । जो है वह है और आप उससे एक हो सकते हैं और उपलब्ध कर सकते हैं आनंद का क्षण, अस्तित्व का क्षण, जागरूकता का क्षण ।
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इस देश में हमने उसे सत्-चित्त-आनंद कहा है - समग्र जागरूकता का क्षण, समग्र आनंद का क्षण, समग्र अस्तित्व का क्षण । एक बार भी अगर आपको उसकी झलक लग गई तो फिर कोई प्रश्न नहीं रहेगा, कोई समस्या नहीं रहेगी । आप वास्तविकता के साथ आराम से रहेंगे । तब आप वास्तविकता के साथ *होने दो*, *लेट गो* की मनोदशा में होंगे आप उसके साथ बहेंगे । आप उसके साथ जिएंगे, उसके साथ श्वास लेंगे । आप उसके साथ एक हो जाएंगे, आप वही हो जाएंगे ।

🌻 ओशो 🌻
पाथेय / सीमाओं के पार
*बियांड एंड बियांड, का अनुवाद से संकलन ।*
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