#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*तहां शब्द सपरश रूप रस बन,*
*गन्ध तरु बिस्तार ।*
*तहां अति मनोरथ कुसम फूले,*
*लोभ अलि गुंजार ॥*
*चक्रवाक मोर चकोर चातक*
*पिक ॠषीक उचार ।*
*तरल तृष्णा बहत सरिता*
*महा तीक्षण धार ॥२॥*
वहाँ शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध – ये पाँचों विषय इस वृक्ष की शाखाएँ हैं । वहाँ हमारी मन:कामनाएँ पुष्प बनी हैं, यहाँ लोभ ही भ्रमरों का गुञ्जन है । इन्द्रियों(ॠषीक) का क्रिया कर्म ही जिनको हम चातक, मोह, चातक, चकवा, कोयल कह सकते हैं, इनकी चेष्टाएँ हैं । यहाँ हमारी बहती हुई तृष्णा ही नदी की तीक्ष्ण धारा है ॥२॥
(क्रमशः)

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