मंगलवार, 11 जून 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू अनुभै वाणी अगम को, ले गई संग लगाइ ।*
*अगह गहै, अकह कहै, अभेद भेद लहाइ ॥*
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साभार ~ Soni Manoj

◆ *अस्तित्व केवल एक ही भाषा जानता है ..., और वह है मौन की ।* ◆ √
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धर्म को किन्हीं बिचौलियों की ..., जरूरत नहीं होती, तुम्हारे और अस्तित्व के बीच सीधा सम्बन्ध है । सारा कुछ जो तुम्हें सीखना है वह है अस्तित्व की भाषा को समझना । तुम मनुष्य की भाषाएं जानते हो, लेकिन वे अस्तित्व की भाषाएं नहीं हैं ।
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अस्तित्व केवल एक ही भाषा जानता है : और वह है मौन की । यदि तुम भी मौन हो सको तो तुम सत्य को, जीवन के अर्थ को और सब कुछ जो विद्यमान है उसकी सार्थकता को समझ सकोगे । और दूसरा कोई भी नहीं है जो इनकी व्याख्या तुम्हारे लिए कर सके ।
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प्रत्येक को इसे अपने लिए स्वयं ही प्राप्त करना होता है । तुम्हारे लिए कोई अन्य इस कार्य को नहीं कर सकता ।
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यदि लोग बिना किसी नेतृत्व के, बिना किसी व्यक्ति के बताए कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है, बिना किसी व्यक्ति द्वारा दिए गए नक्शों के जिनका उन्हें अनुसरण करना है, सत्य की तरफ बढ़ने लगें, तो लाखों-करोड़ों लोग इस अस्तित्व को समझने में समर्थ हो सकेंगे - क्योंकि हमारे हृदय की धड़कन ही जगत् के हृदय की धड़कन भी है, हमारा जीवन सम्पूर्ण के जीवन का ही एक अंश है ।
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हम अजनबी नहीं है, हम कहीं अन्यत्र से नहीं आ रहे हैं, हम अस्तित्व के भीतर ही पनप रहे हैं । हम इसके हिस्से हैं, इसके जरूरी हिस्से - सिर्फ हमें पर्याप्त मौन होना है ताकि हम उसे सुन सकें जो शब्दों में नहीं कहा जा सकता है : अस्तित्व का संगीत, अस्तित्व का महत उल्लास, अस्तित्व का सतत उत्सव ।
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एक बार यह हमारे हृदय में प्रवेश करने लगे, तो रूपांतरण आता है । और वही एकमात्र उपाय है कि कोई धार्मिक बनता है, न कि गिरजाघरों में जाने से जो कि मनुष्य द्वारा निर्मित किए गए हैं, न कि शास्त्रों के पढ़ने से जो कि मनुष्य द्वारा बनाए गए हैं ।
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🌷ओशो🌷

जरथुस्त्रा : ए गॉड दैट कैन डांस -
7 अप्रैल 1987, सांय
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