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*दादू टीका राम को, दूसर दीजे नांहि ।*
*ज्ञान ध्यान तप भेष पक्ष, सब आये उस मांहि ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सेवा निष्फल का अंग ८०*
इस अंग में सेवा निष्फल होने विषयक विचार कर रहे हैं ~
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शक्ति१ सलिल बहु विधि खरच, सांई सूर सु लेय ।
नाम अर्थ औरै लगे, तो पलटा नहिं देय ॥१॥
जल को किसी भी काम में खर्च करो, उसे सूर्य ही लेते हैं, किन्तु किसी अन्य के नाम से दिया जाय तब उसका पीछा फल सूर्य नहीं देते, सूर्य के नाम से ही चढाया जाय तब सूर्य फल देता है, वैसे ही धन१ किसी भी काम में खर्चो, उसे भगवान ही लेते हैं किन्तु अन्य के नाम से धन खर्चने पर उसका फल भगवान् नहीं देते भगवान के नाम पर खर्चने से ही भगवान् फल देते हैं । इस प्रकार भगवद् विमुख की सेवा निष्फल जाती है ।
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सप्तवार अठसठ सहित, पुन्य पर्व देवी देव ।
सब पूजा प्रभु को चढै, सेवक निष्फल सेव ॥२॥
सात वार में और ६८ तीर्थो में पर्व के समान जो पून्य किया जाता है तथा देवी देवताओं की पूजा की जाती है, वह सब पूजा प्रभु को ही चढती है किन्तु प्रभु के नाम न होने से प्रभु से मिलने का फल नहीं मिलता । अत: उक्त प्रकार सेवा करने वाले की सेवा निष्फल हो जाती है ।
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रज्जब भाव न भूमी सों, पै धन धरती खाय ।
यूं अनहित थिति१ लेय प्रभु, जीव जड़ निष्फल जाय ॥३॥
पृथ्वी से प्रेम तो नहीं होता किन्तु फिर भी पृथ्वी में रक्खे हुये अन्नादि धन को पृथ्वी खा जाती है अर्थात गलकर पृथ्वी में ही मिल जाते हैं, वैसे ही बिना प्रेम की स्थिति में भी अर्थात प्रेमपूर्वक न देने पर भी प्रभु ले ही लेते हैं, किन्तु ऐसे जड़ जीव की सेवा निष्फल जाती है ।
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जड़ पात्रों में परसिये, देखो चेतन खाय ।
त्यों बासन ब्रह्माण्ड के, बाबा१ लेय उठाय ॥४॥
देखो, थाली आदि जड़ बर्तनों में भोजन परसा जाता है किन्तु खाता चेतन है, वैसे ही ब्रह्माण्ड के देवी देवतादि रूप बर्तनों में जो रक्खा जाता है अर्थात उनके चढाया जाता है, उसका सबको चेतन रूप परमात्मा१ ही उठा लेते हैं ।
(क्रमशः)

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