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*मेरा गुरु ऐसा ज्ञान बतावै ।*
*मन पवना गहि आतम खेला,*
*सहज शून्य घर मेला ।*
*अगम अगोचर आप अकेला,*
*अकेला मेला खेला ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. २४१)
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साभार ~ Soni Manoj
*• निर्भरता तो दासता ही है • √*
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किस कदर सीधा सहल साफ है यह रस्ता देखो न किसी शाख का साया है, न दीवार की टेक न किसी आंख की आहट, न किसी चेहरे का शोर न कोई दाग जहां बैठ के सुस्ताए कोई दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं चंद कदमों के निशां, हां, कभी मिलते हैं कहीं साथ चलते हैं जो कुछ दूर फकत चंद कदम और फिर टूट के गिरते हैं यह कहते हुए अपनी तनहाई लिए आप चलो, तन्हा, अकेले साथ आए जो यहां कोई नहीं...
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अच्छा है कि तुम्हें परमात्मा तक अकेले ही पहुंचने की संभावना है । नहीं तो किसी पर निर्भर होना पड़ता । और निर्भरता से कभी कोई मुक्ति नहीं आती । निर्भरता तो गुलामी का ही एक अच्छा नाम है । निर्भरता तो दासता ही है । वह दासता की ही दास्तान है - नए ढंग से लिखी गयी; नए लफ्जों में, नए शब्दों में, नए रूप-रंग से; लेकिन बात वही है ।
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इसलिए कोई सदगुरु तुम्हें गुलाम नहीं बनाता । और जो गुलाम बना ले, वहां से भाग जाना । वहां क्षण भर मत रुकना । वहां रुकना खतरनाक है । जो तुम्हें कहे कि मेरे बिना तुम्हारा कुछ भी नहीं होगा; जो कहे कि मेरे बिना तुम कभी भी नहीं पहुंच सकोगे; जो कहे : मेरे पीछे ही चलते रहना, तो ही परमात्मा मिलेगा, नहीं तो चूक जाओगे - ऐसा जो कोई कहता हो, उससे बचना ।
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उसे स्वयं भी अभी नहीं मिला है । क्योंकि यदि उसे स्वयं मिला होता, तो एक बात उसे साफ हो गयी होती कि परमात्मा जब मिलता है, एकांत में मिलता है; वहां कोई नहीं होता; कोई दूसरा नहीं होता । उसे परमात्मा तो मिला ही नहीं है; उसने लोगों के शोषण करने का नया ढंग, नयी तरकीब ईजाद कर ली है । उसने एक जाल ईजाद कर लिया है, जिसमें दूसरों की गरदनें फंस जाएंगी ।
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ऐसा आदमी धार्मिक नहीं है, राजनैतिक है । ऐसा आदमी गुरु नहीं है, नेता है । ऐसा आदमी भीड़-भाड़ को अपने पीछे खडा़ करके अहंकार का रस लेना चाहता है । इस आदमी से सावधान रहना । इस आदमी से दूर-दूर रहना । इस आदमी के पास मत आना ।
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जो तुमसे कहे कि मेरे बिना परमात्मा नहीं मिलेगा, वह महान से महान असत्य बोल रहा है । क्योंकि परमात्मा उतना ही तुम्हारा है, जितना उसका । हां, यह हो सकता है कि तुम जरा लड़खड़ाते हो । वह कम लड़खड़ाता है । या उसकी लड़खड़ाहट मिट गयी है और वह तुम्हें चलने का ढंग, शैली सिखा सकता है । हां, यह हो सकता है कि उसे तैरना आ गया और तुम उसे देखकर तैरना सीख ले सकते हो ।
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लेकिन उसके कंधों का सहारा मत लेना, अन्यथा दूसरा किनारा कभी न आएगा । उसके कंधों पर निर्भर मत हो जाना, नहीं तो वही तुम्हारी बर्बादी का कारण होगा । इसी तरह तो यह देश बरबाद हुआ । यहां मिथ्या गुरुओं ने लोगों को गुलाम बना लिया । इस मुल्क को गुलामी की आदत पड़ गयी । इस मुल्क को निर्भर रहने की आदत पड़ गयी ।
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यह जो हजार साल इस देश में गुलामी आयी, इसके पीछे और कोई कारण नहीं है । इसके पीछे न तो मुसलमान हैं, न मुगल हैं, न तुर्क हैं, न हूण हैं, न अंग्रेज हैं । इसके पीछे तुम्हारे मिथ्या गुरुओं का जाल है ।
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मिथ्या गुरुओं ने तुम्हें सदियों से यह सिखाया है : निर्भर होना उन्होंने इतना निर्भर होना सिखा दिया कि जब कोई राजनैतिक रूप से भी तुम्हारी छाती पर सवार हो गया, तुम उसी पर निर्भर हो गए । तुम जी-हुजूर उसी को कहने लगे तुम उसी के सामने सिर झुकाकर खडे़ हो गए । तुम्हें आजादी का रस ही नहीं लगा; स्वाद ही नहीं लगा ।
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काश ! बुद्ध जैसे गुरुओं की तुमने सुनी होती, तो इस देश में गुलामी का कोई कारण नहीं था । काश ! तुमने व्यक्तित्व सीखा होता, निजता सीखी होती; काश ! तुमने यह सीखा होता कि मुझे मुझी होना है; मुझे किसी दूसरे की प्रतिलिपि नहीं होना है; और मुझे अपना दीया खुद बनना है, तो तुम बाहर के जगत में भी पैर जमाकर खडे़ होते । यह अपमानजनक बात न घटती कि चालीस करोड़ का मुल्क मुट्ठीभर लोगों का गुलाम हो जाए ! कोई भी आ जाए और यह मुल्क गुलाम हो जाए !
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जरूर इस मुल्क की आत्मा में गुलामी की गहरी छाप पड़ गयी । किसने डाली यह छाप ? किसने यह जहर तुम्हारे खून में घोला ? किसने विषाक्त की तुम्हारी आत्मा ? किसने तुम्हें अंधेरे में रहने के लिए विधियां सिखायीं ? तुम्हारे तथाकथित गुरुओं ने । वे गुरु नहीं थे । गुरु तो बुद्ध जैसे ही व्यक्ति होते होते हैं, जो कहते हैं, अप्प दीपो भव !
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• ओशो √ एस धम्मो सनंतनो १२
१२० प्रवचन अप्प दीपो भव ! से संकलन ।
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