सोमवार, 10 जून 2019

= *अज्ञान कसौटी का अंग ७९(७३/७६)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*सहकामी सेवा करैं, मागैं मुग्ध गँवार ।*
*दादू ऐसे बहुत हैं, फल के भूँचनहार ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*अज्ञान कसौटी का अंग ७९* 
अज्ञान कसौटी१ कोटि विधि, काया कसहिं२ अनेक । 
रज्जब निपजै३ साधु मन, सो समझै कोउ एक ॥७३॥ 
अज्ञानजन्य कष्ट१ कोटि प्रकार के हैं, उनके प्राणी उनके द्वारा शरीर को कष्ट२ देते हैं, किन्तु संतों का मन किस साधन से श्रेष्ठ होता३ है, वह साधन कोई विरला ही समझ पाता है । 
कष्ट करामात पाइये, संकट उपजै सिद्धि । 
तप तैं राजा होत है, नरक जाण की विद्धि ॥७४॥ 
कष्ट पाने से करामात प्राप्त होती है, संकट सहन करने से ही सिद्धि मिलती है, तप का कष्ट भोगने से ही राजा बनता है किन्तु करामात, सिद्धि और राज-पद ये नरक में जाने की रीति ही सिखाते हैं । 
रज्जब शठ१ हठ छाडिदे, कर न कामना कष्ट । 
न्याय नीति मग पाँव दे, नष्ट मती२ तज नष्ट ॥७५॥ 
हे मूर्ख१ ! हठ योग की क्रियाओं को छोड़ दे, कामना पूर्ति के लिये कष्ट मत उठा, न्याय - नीति के मार्ग पर पैर रख, हे नष्ट बुद्धि२ वाले प्राणी ! नष्ट करने वाले कामों को छोड़ । 
हठ करि माँगें हरि कनें१, दाता दुष्ट हिं देय । 
स्वाद न ऊपजै वाद पर, क्या लीये में लेय ॥७६॥ 
सकामी प्राणी हरि से१ भी हठ करके माँगते हैं, हरि तो दाता है दुष्ट को भी देता है किन्तु हठ रूप वाद करके लेने से आनन्द नहीं होता, उसके लेने में क्या लेना है, अर्थात कुछ भी नहीं, लेना तो वही है जो अपने आप दे उसी में आनन्द आता है । 
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित अज्ञान कसौटी का अंग ७९ समाप्तः ॥सा. २४२७॥ 
(क्रमशः)

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