शुक्रवार, 14 जून 2019

= *भ्रम सिद्धान्त का अंग ८१(१/४)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*निराधार निज भक्ति कर, निराधार निज सार ।*
*निराधार निज नाम ले, निराधार निराकार ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*भ्रम सिद्धान्त का अंग ८१* 
इस अंग में भ्रम पूर्ण सिद्धान्त विषयक विचार कर रहे हैं ~ 
अहर१ ओड२ आकार के, भोजन भजन अहार । 
पुष्ट प्रीति पग पति लगैं, ता में फेर न सार ॥१॥ 
होठों१ की आड़२ को हटा कर भोजन किया जाय तो उस आहार से शरीर पुष्ट होता है, वैसे ही ब्रह्म के आकार की आड़ है, उसको हटाकर भजन किया जाय अर्थात निराकार का भजन किया जाय तो प्रीति की वृद्धि होकर अपने स्वामी परब्रह्म के स्वरूपमय चरण में जा लगता है अर्थात ब्रह्मरूप ही हो जाता है, फिर उसमें परिवर्तन नहीं होता यह साररूप सिद्धान्त है और आकार में ही अटकना यह भ्रम पूर्ण है । 
रज्जब लगै पन्नग१ पग, नख शिख पीड़ा प्राण । 
तो सुमिरण की सांइयाँ, समझै क्यों ने सुजान ॥२॥ 
पैर में सर्प१ काटता है तब नख से शिखा तक विष की पीड़ा होती है, यह समझ में आ जाता है, फिर हे सुजान ! स्मरण करने वाले की प्रेमा-भक्ति को प्रभु क्यों न समझेंगे ? आकार की उपासना करने से ही भगवान भक्त समझते हैं, यह सिद्धान्त भ्रम पूर्ण है । 
आतम कमल कमोदिनी, शशि सूरज करतार । 
बिच बादल सौं ना बंधै, प्रीति प्रीतमहु पार ॥३॥ 
सूर्य मुखी कमल और कुमुदिनी की प्रीति बीच के बादलों में नहीं बँधती उनको पार करके सूर्य और चन्द्रमा में ही जाती है, वैसे ही निराकार के भक्त जीवात्माओं की प्रीति बीच के आकारों में नहीं रूकती, उनको पार करके अपने प्रियतम निराकार ब्रह्म में ही जाती है । 
सप्त खणों१ मधि शून्य२ इक, त्यों ब्रह्माण्ड इक्कीस । 
खंड हु खंड३ न शून्य के, रज्जब बिसवा बीस ॥४॥ 
आकाश के सातों भागों१ में और वैसे ही इक्कीस ब्रह्मण्डों में आकाश२ एक ही है, खंड-खंड में आकाश के टुकड़े३ नहीं होते, आकाश बीसों बिसवा सब स्थानों में एक ही होता है, वैसे ही सातों आकाशों में और इक्कीस ब्रह्माण्डों में ब्रह्म एक रस व्यापक है, सप्तम आकाश में मानने का तथा किसी ब्रह्माण्ड वा लोक विशेष में ही प्रभु को मानने का सिद्धान्त भ्रम पूर्ण है । 
(क्रमशः)

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