#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*बेली का अँग ३६*
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दादू सूखा रूँखड़ा, काहे न हरिया होइ ।
आपै सींचै अमीरस, सुफल फलिया सोइ ॥७॥
भक्ति रूप हरियाली से रहित सूखे अन्त:करण रूप वृक्ष को, यदि स्वयँ भगवान् अपने कृपामृत - रस से सींचें तो वह क्यों न हरा होगा ? और जो भक्ति रूप हरियाली को प्राप्त हुआ है, उसने ज्ञानरूप फल भी अवश्य ही दिया है ।
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कदे न सूखै रूँखड़ा, जे अमृत सींच्या आप ।
दादू हरिया सो फलै, कछू न व्यापे ताप ॥८॥
यदि जीवात्मा स्वयँ ही सचेत होकर राम - नाम चिन्तन रूप अमृत सीँचता रहे तो, अन्त:करण रूप वृक्ष, काम - क्रोधादि रूप आतप से कभी भी नहीं सूख सकेगा । और जो भक्ति रूप हरियाली से युक्त रहेगा, वह अवश्य ज्ञान रूप फल को प्राप्त होगा तथा उसे कोई भी दु:ख न हो सकेगा ।
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जे घट रोपे रामजी, सींचै अमी अघाइ ।
दादू लागै अमर फल, कबहूं सूख न जाइ ॥९॥
यदि अन्त:करण में रामजी भक्ति बेलि लगा दें और इतना कृपामृत सींचें कि कोई भी आशा न रहे, पूर्ण तृप्ति आ जाय, तब तो अवश्य ही अमरता देने वाला परब्रह्म - प्राप्ति रूप अमर - फल लगेगा ही । फिर तो यह कभी भी पुनर्जन्म रूप शुष्कता को प्राप्त न हो सकेगा ।
(क्रमशः)

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