#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*यह प्रकृति पुरुष मचाइ राष्यौ,*
*सदा करम हिंडोल ।*
*सजि बिबिधि रूप बिकार भूषन,*
*पहरि अंगनि चोल ॥*
*एक नृत्यत एक गावत,*
*मिलि परस्पर लोल ।*
*रति ताल मदन मृदंग बाजत,*
*दुन्दु दुन्दुभि ढोल ॥३॥*
इस प्रकार, प्रकृति एवं पुरुष – दोनों ने मिलकर यह कर्महिंडोला बना रखा है । इसमें विविध रुपविकारों के आभूषण शरीर पर पहन रखे हैं । यहाँ परस्पर मिल जुल कर कोई नाचता है तो कोई गाता है, रति(प्रेम) ताल देती है तो कामदेव मृदंग बजाता है । परस्पर का द्वन्द्व(वैर, द्वैतभाव) ही दुन्दुभि एवं ढोल आदि वाद्य(बाजे) हैं ॥३॥
(क्रमशः)

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