शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(४-६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*साक्षीभूत का अंग ३५*
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*कर्ता साक्षीभूत ~*
*करता है सो करेगा, दादू साक्षीभूत ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, अणकर्ता अवधूत ॥४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासु ! ‘साक्षीभूत’ कहिए सबका कारण चैतन्य वह अन्तर्यामी, ‘कौतिकहारा’ कहिये, तमाशगीर होकर आप विराट रूप, एकान्त दृष्टा, अणकर्ता, कूटस्थ चैतन्य, अवधूत, किसी माया और माया के कार्य से न धूताने वाला, सूत्र आत्मा रूप से आप सबमें व्याप्त हो रहा है । उसी में अपनी वृत्ति को स्थिर कर ॥४॥
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*दादू राजस कर उत्पत्ति करै, सात्विक कर प्रतिपाल ।*
*तामस कर परलै करै, निर्गुण कौतिकहार ॥५॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! वह निर्गुण साक्षी चैतन्य रजोगुण प्रधान प्रकृति से सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति करता है, और सतोगुण द्वारा सबका पालन होता है, तथा तमोगुण प्रधान प्रकृति से सबका संहार करता है ॥५॥
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*दादू ब्रह्म जीव हरि आत्मा, खेलैं गोपी कान्ह ।*
*सकल निरन्तर भर रह्या, साक्षीभूत सुजान ॥६॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! वह साक्षी चैतन्य, आप स्वयं ब्रह्म और जीव रूप से, तथा हरि और आत्मा रूप से, गोपी और कृष्ण की भांति खेल खेल रहे हैं । और हे सुजान साधक ! वही साक्षी चैतन्य सबमें परिपूर्ण रूप से व्याप्त हो रहे हैं ॥६॥
(क्रमशः)

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